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महिला वकीलों के संघर्ष का कड़वा सच: SCBA सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े

मार्च 25, 2026, 12:03 बजे
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महिला वकीलों के संघर्ष का कड़वा सच: SCBA सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े

कोर्ट रूम की भारी भरकम कुर्सियां, फाइलों का अंबार और तारीखों का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला। बाहर से देखने पर ये दुनिया रसूख और ताकत की लगती है, लेकिन इस काले कोट के पीछे एक ऐसी कहानी दबी है जिसे अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन SCBA का हालिया सर्वे कोई साधारण काग़ज़ का टुकड़ा नहीं है; यह उन हज़ारों महिला वकीलों की दबी हुई आवाज़ है जो हर रोज़ अदालत की सीढ़ियां चढ़ते हुए न केवल कानून की लड़ाई लड़ती हैं, बल्कि अपने अस्तित्व और बराबरी के लिए भी जूझती हैं। सर्वे कहता है कि 80% से ज़्यादा महिला वकीलों को लगता है कि उनका सफर पुरुष साथियों के मुकाबले कहीं ज़्यादा काँटों भरा है


पृष्ठभूमि: यह मुद्दा आम आदमी के लिए क्यों मायने रखता है

आप सोच रहे होंगे कि अगर वकीलों को दिक्कत है, तो इससे एक आम नागरिक या क्लाइंट को क्या फर्क पड़ता है? फर्क पड़ता है, और बहुत गहरा पड़ता है। भारत में लगभग 15% से भी कम महिला जज हैं और वकीलों की संख्या में भी भारी असमानता है। जब न्याय करने वाली और न्याय दिलाने वाली मशीनरी में महिलाओं की कमी होगी या उन्हें दबाया जाएगा, तो आधी आबादी महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों जैसे घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर उत्पीड़न में सहानुभूति और सही दृष्टिकोण की कमी साफ दिखने लगती है।

NCRB के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले हर साल बढ़ रहे हैं। अब कल्पना कीजिए, एक पीड़ित महिला जब कोर्ट पहुंचती है और उसे वहां का माहौल ही पुरुष-प्रधान और डराने वाला लगता है, तो क्या वह खुलकर अपनी बात कह पाएगी? एक छोटी सी कहानी सुनिए-मेरी एक जूनियर थी, अंजलि। वह एक रेप केस की पैरवी कर रही थी। कोर्ट के भरे कमरे में एक वरिष्ठ पुरुष वकील ने उसकी दलील के बीच में टिप्पणी की, बेटा अभी तुम नई हो, घर गृहस्थी भी देखनी होगी, इन पेचीदा मामलों में क्यों पड़ती हो? अंजलि का चेहरा लाल हो गया उसकी दलीलें रुक गईं। यह उस वकील की हार नहीं थी, यह उस सिस्टम की हार थी जिसने अंजलि को छोटा महसूस कराया। लेकिन इससे पहले कि हम इस सामाजिक ढांचे पर और बात करें, यह समझना जरूरी है कि कानून की किताबें इस बारे में क्या कहती हैं।

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कानूनी ढांचा: Law Explained Like a Friend

अक्सर लोग सोचते हैं कि कोर्ट के अंदर के भेदभाव के लिए कोई कानून नहीं है। यह गलत है। भारत का संविधान और हमारे नए कानूनी संहिताएं (BNS) हर नागरिक को बराबरी का हक देती हैं।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 (Article 15) — सरल भाषा में: राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। इसका मतलब आपके लिए: कोर्ट परिसर भी एक सार्वजनिक स्थान है और वहां जेंडर के आधार पर कोई भी भेदभाव असंवैधानिक है।

इसके अलावा, विशाखा गाइडलाइंस और अब कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकथाम निषेध और निवारण अधिनियम 2013 स्पष्ट रूप से लागू होते हैं। भले ही वकील किसी के कर्मचारी नहीं होते, लेकिन बार काउंसिल और कोर्ट परिसर उनके लिए कार्यस्थल हैं।

2023 के नए कानूनों Bharatiya Nyaya Sanhita में भी महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले कृत्यों पर सख्त रुख अपनाया गया है। अगर कोई वरिष्ठ वकील या सहकर्मी किसी महिला वकील को डराता है या उसकी राह में रोड़े अटकाता है, तो वह केवल प्रोफेशनल मिसकंडक्ट नहीं बल्कि कानूनी अपराध की श्रेणी में भी आ सकता है।


महिला वकीलों के 5 बुनियादी कानूनी अधिकार

अगर आप एक महिला वकील हैं या इस पेशे में आना चाहती हैं, तो इन अधिकारों को अपनी ढाल बनाइए:

1. कार्यस्थल पर सुरक्षा (POSH Act): हर बार एसोसिएशन और कोर्ट में एक 'आंतरिक शिकायत समिति' (ICC) होना अनिवार्य है। अगर कोई आपके साथ बदसलूकी करता है, तो आप वहां शिकायत कर सकती हैं

2. मातृत्व लाभ (Maternity Benefits): सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि महिला वकीलों को उनकी गर्भावस्था के दौरान प्रैक्टिस में रियायत और बार की सदस्यता में निरंतरता मिलनी चाहिए

3. गरिमा का अधिकार: किसी भी बहस के दौरान व्यक्तिगत टिप्पणी या जेंडर-आधारित कटाक्ष करना 'कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट' और 'प्रोफेशनल एथिक्स' का उल्लंघन है

4. समान अवसर: सरकारी वकील (Public Prosecutor) या एम्पैनलमेंट की नियुक्तियों में महिलाओं को बराबर का कोटा और अवसर मिलना उनका हक है

5. इंफ्रास्ट्रक्चर का अधिकार: यह सुनने में छोटा लग सकता है, लेकिन हर कोर्ट में स्वच्छ टॉयलेट्स और 'क्रेच' (बच्चों के लिए कमरा) की सुविधा मांगना आपका कानूनी हक है

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हाल के मामले: जब कोर्ट ने खुद को आईना दिखाया

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में Gender Sensitization पर एक हैंडबुक जारी की है। इसमें साफ कहा गया है कि वकील और जज करियर वुमन, रखैल या कमजोर अबला जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।


Expert की राय

सुप्रीम कोर्ट की एक वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है, "सिस्टम में बदलाव ऊपर से नहीं, जमीन से आएगा। जब तक क्लाइंट्स महिलाओं की काबिलियत पर भरोसा नहीं करेंगे, तब तक 80% का यह आंकड़ा नहीं बदलेगा।"

मेरा मानना है कि यह केवल वकीलों की लड़ाई नहीं है। यह उस हर महिला की लड़ाई है जो किसी भी पुरुष-प्रधान क्षेत्र में अपना रास्ता बना रही है। वकालत में 'पॉवर डायनामिक्स' बहुत मजबूत होती है, इसलिए यहां संघर्ष थोड़ा ज़्यादा है


आप क्या करें: Practical Guidance

अगर आप इस स्थिति में हैं, तो ये कदम उठाएं:

  1. मेंटर खोजें: किसी अनुभवी महिला वकील को अपना गुरु बनाएं
  2. दस्तावेजीकरण: अगर भेदभाव या उत्पीड़न हो, तो ईमेल या लिखित रिकॉर्ड रखें
  3. हेल्पलाइन: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की ग्रीवेंस सेल में संपर्क करें
  4. बोलना सीखें: अगर कोर्ट में कोई गलत टिप्पणी करे, तो शालीनता से लेकिन मजबूती से विरोध दर्ज कराएं

यह सफर लंबा है, लेकिन नामुमकिन नहीं। याद रखिए, कानून की देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए नहीं बंधी कि वह कुछ देख नहीं सकती, बल्कि इसलिए बंधी है ताकि वह जेंडर, जाति या रुतबा देखे बिना सिर्फ सच देख सके। वकालत सिर्फ एक पेशा नहीं, एक जज्बा है। 80% महिलाओं को मुश्किल लग रहा है, इसका मतलब है कि वे अभी भी मैदान में डटी हुई हैं। वे पीछे नहीं हटीं। और यही जीत की पहली सीढ़ी है

क्या आपको भी लगता है कि आपके कार्यस्थल पर जेंडर के आधार पर अंतर किया जाता है? अपना अनुभव नीचे कमेंट में जरूर शेयर करें। आपकी एक कहानी किसी और का हौसला बन सकती है

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1: SCBA सर्वे का मुख्य निष्कर्ष क्या है?

A: SCBA सर्वे के अनुसार, 80% से अधिक महिला वकीलों को लगता है कि पुरुष साथियों की तुलना में उनका पेशेवर सफर बहुत कठिन है। इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, जेंडर बायस और नेटवर्किंग के अवसरों की कमी को मुख्य कारण बताया गया है।

Q2: क्या महिला वकील कोर्ट में भेदभाव के खिलाफ शिकायत कर सकती हैं?

A: हाँ, हर कोर्ट और बार एसोसिएशन में 'Internal Complaints Committee' (ICC) होती है। इसके अलावा, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के तहत 'प्रोफेशनल मिसकंडक्ट' की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है

Q3: नए कानूनों (BNS) में महिला वकीलों के लिए क्या सुरक्षा है?

A: BNS में महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले किसी भी कृत्य के लिए सख्त सजा का प्रावधान है। यह कानून कार्यस्थल (कोर्ट) पर होने वाले दुर्व्यवहार पर भी लागू होता है

Q4: क्या महिला वकीलों को चैंबर अलॉटमेंट में प्राथमिकता मिलती है?

A: कई अदालतों ने अब महिलाओं के लिए चैंबर अलॉटमेंट में कोटा या विशेष प्राथमिकता देना शुरू किया है, हालांकि यह हर बार एसोसिएशन के नियमों पर निर्भर करता है

Q5: अगर कोई सीनियर वकील परेशान करे तो क्या करें?

A: घबराएं नहीं। सबसे पहले लिखित में विरोध दर्ज करें। यदि बात न बने तो स्थानीय बार एसोसिएशन और जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी (GSICC) को सूचित करें। कानून आपके साथ है

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नाज़िम
नाज़िम

नाज़िम livedastak.com के एक कुशल और समर्पित लेखक हैं, जिन्हें Crime & Law विषयों पर लेखन का लगभग 3 वर्षों का अनुभव है। वे अपराध और कानून से जुड़े जटिल एवं संवेदनशील मुद्दों पर गहन शोध के आधार पर सटीक, प्रमाणिक और संतुलित जानकारी प्रस्तुत करते हैं। उनकी लेखन शैली स्पष्ट, तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक है, जिससे पाठकों को कठिन कानूनी विषय भी सरलता से समझ में आते हैं। नाज़िम का उद्देश्य है कि पाठकों तक ताज़ा, विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी सरल हिंदी में पहुँचे, ताकि वे जागरूक और सूचित रह सकें। उनके लेख निष्पक्षता, तथ्यों की प्रा…

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