वो दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे कचहरी की सीढ़ियां चढ़ रहे थे चेहरे पर डर था लेकिन आंखों में एक उम्मीद कि कानून उन्हें सुरक्षा देगा उन्हें लगा था कि लिव-इन रिलेशनशिप का टैग उनके हर उस कदम को जायज ठहरा देगा जो समाज की नजरों में गलत है लेकिन जैसे ही वकील साहब ने हाईकोर्ट का ताजा फैसला पढ़कर सुनाया उनके पैरों तले जमीन खिसक गई
अक्सर हमें लगता है कि दो बालिग अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं तो पुलिस या परिवार क्या कर लेगा लेकिन कानून की बारीकियां इतनी सीधी नहीं होतीं खासकर तब जब आप पहले से शादीशुदा हों और बिना तलाक लिए किसी और के साथ घर बसाने की सोच रहे हों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा आईना दिखाया है जिसने हजारों प्रेमियों की नींद उड़ा दी है अगर आप भी किसी ऐसे रिश्ते में हैं या आपके किसी करीबी के साथ ऐसा हो रहा है तो रुकिए आज एक वकील और एक पत्रकार की नजर से समझिए कि कानून की किताब में आपकी 'मोहब्बत' की जगह कहां है क्योंकि कानून की दुनिया में मर्जी से बड़ा मर्यादा और वैधानिक अधिकार होता है। चलिए, इस उलझन को सुलझाते हैं
लिव-इन और शादीशुदा समाज: आखिर विवाद क्या है
आज के दौर में लिव-इन रिलेशनशिप कोई नई बात नहीं रह गई है लेकिन जब इसमें शादीशुदा होने का पेच फंसता है तो मामला पेचीदा हो जाता है NCRB के आंकड़े बताते हैं कि पारिवारिक विवादों और अवैध संबंधों से जुड़े अपराधों में पिछले कुछ सालों में तेजी आई है
मान लीजिए रमेश और सरिता दोनों अपनी-अपनी शादियों से खुश नहीं हैं वे घर छोड़कर साथ रहने लगते हैं और पुलिस से सुरक्षा मांगते हैं वे सोचते हैं कि आर्टिकल 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) उन्हें सुरक्षा कवच देगा लेकिन समाज में बढ़ती इस प्रवृत्ति ने अदालतों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है क्या व्यक्तिगत आजादी के नाम पर किसी दूसरे के कानूनी अधिकारों (जैसे कि पहले पति या पत्नी का हक) को कुचला जा सकता है?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का ताजा फैसला इसी दोराहे पर खड़ा है एक तरफ व्यक्तिगत पसंद है तो दूसरी तरफ कानून की वो लक्ष्मण रेखा जो शादी को एक पवित्र और कानूनी अनुबंध मानती है लेकिन इससे पहले कि हम इस फैसले की गहराई में उतरें हमें उस कानूनी ढांचे को समझना होगा जो इन रिश्तों को कंट्रोल करता है
यह भी पढ़ें:- कानूनी मदद का असली सच: MP विधिक सेवा प्राधिकरण की नई ट्रेनिंग क्यों है जरूरी
कानून की जुबानी: क्या कहता है आपका अधिकार?
देखिए कानून को किसी भारी-भरकम किताब की तरह मत देखिए इसे ऐसे समझिए जैसे खेल के नियम होते हैं भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को सुप्रीम कोर्ट ने शादी के समान माना है, लेकिन कुछ शर्तों के साथ
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82/84 (पुरानी IPC 494/495) - सरल भाषा में: अगर आप शादीशुदा हैं और बिना तलाक लिए किसी और के साथ संबंध बनाते हैं या दूसरी शादी करते हैं, तो यह अपराध है
इसका मतलब आपके लिए: लिव-इन में रहना सिर्फ तब तक सुरक्षित है जब तक आप कानूनी रूप से सिंगल हैं या आपका पार्टनर आपके साथ रहने के लिए स्वतंत्र है
जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने साफ कहा कि आजादी का मतलब यह नहीं कि आप किसी और के कानूनी हक को छीन लें अगर आपकी पत्नी या पति जीवित है, तो उन्हें आपके साथ रहने का वैधानिक अधिकार है। आप इसे अपनी मर्जी बताकर खत्म नहीं कर सकते
क्या शादीशुदा व्यक्ति सुरक्षा मांग सकता है? प्रक्रिया समझिए
अगर आप ऐसी स्थिति में हैं, तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशानुसार ये 5 कदम आपके लिए जानना जरूरी हैं
चरण 1: अपनी वैधानिक स्थिति की जांच करें: सबसे पहले देखें कि क्या आपके पास तलाक की डिक्री है बिना डिक्री के आप कानून की नजर में अभी भी विवाहित हैं
चरण 2: सुरक्षा के लिए मैंडमस (Mandamus) की मांग: अदालत में रिट याचिका दायर करना कि पुलिस आपको सुरक्षा दे
चरण 3: पुलिस अधीक्षक SP को आवेदन: अगर जान का खतरा है तो सीधे कोर्ट जाने से पहले स्थानीय SP को लिखित शिकायत दें
चरण 4: घरेलू हिंसा अधिनियम का सहारा: महिलाएं लिव-इन में रहते हुए भी प्रोटेक्शन मांग सकती हैं लेकिन शादीशुदा पुरुष के मामले में यह कवच कमजोर हो जाता है
चरण 5: सक्षम न्यायालय से डिक्री प्राप्त करना: कानूनी रूप से साथ रहने का इकलौता सही रास्ता यही है कि पहले पुराने रिश्ते को कानूनी रूप से खत्म किया जाए
यह भी पढ़ें:- सड़क हादसे में मौत: मुआवजे का पूरा सच और ₹33.9 लाख का यह कानूनी हक
कोर्ट के दो अलग सुर: जस्टिस सिंह बनाम डिवीजन बेंच
कानून में अक्सर एक ही मुद्दे पर अलग-अलग राय देखने को मिलती है।
- जस्टिस विवेक कुमार सिंह का फैसला (20 मार्च 2026): उन्होंने याचिका खारिज करते हुए कहा कि बिना तलाक लिए लिव-इन में रहना संभावित अपराध धारा 494 IPC/BNS को संरक्षण देने जैसा है इसलिए कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी
- डिवीजन बेंच (जस्टिस जे.जे. मुनीर व जस्टिस तरून सक्सेना): इस फैसले के 5 दिन बाद एक अन्य मामले में बेंच ने कहा कि बालिग महिला का विवाहित पुरुष के साथ रहना अपने आप में अपराध नहीं है उन्होंने नैतिकता को कानून से अलग रखने की बात कही और जोड़े को गिरफ्तारी से सुरक्षा दी
यह आपके लिए क्यों मायने रखता है? इसका मतलब है कि कानून अभी भी इस मुद्दे पर इवॉल्व हो रहा है। सुरक्षा मिलना या न मिलना इस बात पर निर्भर करता है कि आपके केस के तथ्य क्या हैं
अगर नियम टूटे तो कितनी होगी सजा
बिना तलाक के लिव-इन या दूसरी शादी के मामले में दंड के प्रावधान सख्त हैं
अपराध | संबंधित धारा (BNS/BNS) | अधिकतम सज़ा | जमानत योग्य? |
|---|---|---|---|
पति/पत्नी के रहते दूसरी शादी | धारा 82 (BNS) / 494 (IPC) | 7 साल तक जेल + जुर्माना | हाँ (जमानती) |
पिछली शादी छिपाकर दूसरी शादी | धारा 83 (BNS) / 495 (IPC) | 10 साल तक जेल + जुर्माना | गैर-जमानती |
आपराधिक षडयंत्र | धारा 61 (BNS) / 120B (IPC) | अपराध के अनुसार | केस पर निर्भर |
ध्यान दें: लिव-इन को सीधे शादी नहीं माना जाता, लेकिन यदि शिकायत दर्ज हो, तो कानूनी उलझनें बहुत बढ़ जाती हैं
यह भी पढ़ें:- इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मेडिकल क्लेम का पूरा सच, अब वारिसों को हक
क्या कहते हैं कानून के जानकार
दिल्ली हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुसार अदालतें अब रिश्तों की पवित्रता और व्यक्तिगत पसंद के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं जस्टिस विवेक सिंह का रुख सख्त है क्योंकि वे कानून के दंडात्मक प्रावधानों को दरकिनार नहीं करना चाहते
मेरी राय में, कानून की यह व्याख्या उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो सोचते हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप उनके लिए एस्केप रूट बचने का रास्ता है अगर आप शादीशुदा हैं तो कानून आपसे उम्मीद करता है कि आप पहले अपनी जिम्मेदारियों और कानूनी दायित्वों को पूरा करें
क्या कानून बदल रहा है
हाल ही में लागू हुए भारतीय न्याय संहिता BNS और उत्तराखंड समान नागरिक संहिता UCC जैसे कानूनों में लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन की बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि इससे महिलाओं को सुरक्षा मिलेगी और अपराध कम होंगे हालांकि आलोचक इसे निजता के अधिकार का हनन मानते हैं विवाद इस बात पर है कि क्या राज्य को यह तय करना चाहिए कि दो वयस्क कैसे रहें
यह भी पढ़ें:- Bombay High Court का बड़ा फैसला: ट्रेसपासिंग दलील खारिज, पीड़ित परिवार को मुआवजा
आप क्या करें — Practical Guidance
अगर आप इस उलझन में हैं, तो ये करें
- दस्तावेज संभालें: अगर आप अलग रह रहे हैं तो अलगाव (Separation) के सबूत रखें
- कानूनी सलाह लें: किसी अच्छे वकील से अपनी स्थिति पर बात करें। क्या आपका केस क्रुएल्टी के आधार पर तलाक का बनता है
- सुरक्षा सर्वोपरि: अगर जान का खतरा है, तो 112 नंबर या महिला हेल्पलाइन 1091 पर तुरंत संपर्क करें
- ईमानदारी बरतें: अपने पार्टनर से अपनी वैवाहिक स्थिति कभी न छिपाएं, वरना आप पर धोखाधड़ी धारा 83 BNS का केस हो सकता है
कानून और दिल की जंग
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला हमें याद दिलाता है कि हम एक ऐसे समाज और कानूनी व्यवस्था का हिस्सा हैं जहां अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं बिना तलाक लिव-इन नहीं - यह सिर्फ एक हेडलाइन नहीं है बल्कि उन हजारों लोगों के लिए एक कड़वा सच है जो शॉर्टकट ढूंढ रहे थे
कानून अंधा नहीं होता वह बस सबूत और प्रक्रिया देखता है अगर आप अपने हक के लिए लड़ना चाहते हैं तो पहले खुद को कानून की नजर में सही साबित करना होगा यह सफर मुश्किल लग सकता है लेकिन सच और सही प्रक्रिया का साथ आपको कभी हारने नहीं देगा आखिर में कानून आपको डराने के लिए नहीं बल्कि समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए है अपनी आजादी का जश्न मनाएं लेकिन कानून के दायरे में रहकर
यह भी पढ़ें:- पत्नी की हत्या को आत्महत्या बताने के मामले में गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1: क्या बिना तलाक लिए लिव-इन में रहना गैर-कानूनी है?
A: कानून के अनुसार यदि एक व्यक्ति विवाहित है और उसका जीवनसाथी जीवित है तो किसी और के साथ लिव-इन में रहना व्यभिचार की श्रेणी में आ सकता है और तलाक का आधार बन सकता है इलाहाबाद हाईकोर्ट के अनुसार, बिना तलाक के ऐसे रिश्ते को कानूनी सुरक्षा नहीं दी जा सकती
Q2: क्या लिव-इन पार्टनर पुलिस सुरक्षा की मांग कर सकता है?
A: हाँ कोई भी नागरिक जान का खतरा होने पर सुरक्षा मांग सकता है हालांकि अगर मामला शादीशुदा व्यक्ति के लिव-इन का है तो कुछ जज इसे अपराध को बढ़ावा देना मानकर सुरक्षा देने से इनकार कर सकते हैं जैसा कि हालिया फैसले में हुआ
Q3: लिव-इन में पैदा हुए बच्चों का क्या अधिकार होता है?
A: सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे वैध माने जाएंगे और उन्हें अपने पिता की संपत्ति में पूरा अधिकार मिलेगा
Q4: क्या मेरा पार्टनर मुझ पर शादी का दबाव बना सकता है?
A: लिव-इन में रहने का मतलब शादी का वादा नहीं होता हालांकि अगर शादी का झूठा झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए गए हैं तो भारतीय न्याय संहिता BNS के तहत कड़ी कार्रवाई हो सकती है
Q5: क्या लिव-इन पार्टनर भरण-पोषण मांग सकता है?
A: हाँ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत यदि रिश्ता 'शादी की प्रकृति' जैसा है तो महिला पार्टनर भरण-पोषण का दावा कर सकती है