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भारत में जजों की कमी: क्यों सालों तक लटकते हैं केस? जानिए पूरी सच्चाई

मार्च 31, 2026, 11:38 बजे
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भारत में जजों की कमी: क्यों सालों तक लटकते हैं केस? जानिए पूरी सच्चाई

कल्पना कीजिए आप एक युवा वकील हैं दिन-रात मेहनत करके आपने अपनी पहचान बनाई है एक दिन खबर आती है कि आपका नाम हाई कोर्ट का जज बनने के लिए चुना गया है आप खुश होते हैं परिवार में जश्न मनता है लेकिन फिर शुरू होता है एक अंतहीन इंतज़ार महीने बीतते हैं, फिर साल तक सरकार आपकी फाइल दबाकर बैठी है इधर वकीली के काम में क्लाइंट्स आपके पास आना बंद कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि साहब तो अब जज बनने वाले हैं न आप इधर के रहते हैं, न उधर के

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है बल्कि भारत की न्यायपालिका का वो कड़वा सच है जिसे जस्टिस अभय ओक ने हाल ही में मुंबई के एक मंच से बेबाकी से रखा है जब देश का एक सिटिंग सुप्रीम कोर्ट जज यह कहे कि "सिस्टम नागरिकों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहा है तो समझ लीजिए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है क्या आपने कभी सोचा है कि आपके छोटे से केस का फैसला आने में 10 साल क्यों लग जाते हैं इसका जवाब उन फाइलों में छिपा है जो मंत्रालय के गलियारों में धूल फांक रही हैं


पृष्ठभूमि — यह मुद्दा आपके और मेरे लिए क्यों मायने रखता है

अक्सर हमें लगता है कि जजों की नियुक्ति या कॉलेजियम के विवाद बड़े वकीलों और नेताओं के बीच की बात है। लेकिन सच यह है कि इसका सीधा असर आपकी ज़मानत आपके प्रॉपर्टी विवाद और आपके चेक बाउंस के केस पर पड़ता है। National Judicial Data Grid के अनुसार भारत की अदालतों में 5 करोड़ से ज़्यादा मामले लंबित हैं

जस्टिस ओक ने जो मुद्दा उठाया है, वह उस बैटल की ओर इशारा करता है जो न्यायपालिका और कार्यपालिका सरकार के बीच चल रही है जब सरकार कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए नामों को मंज़ूरी नहीं देती तो अदालतों में सीटें खाली रहती हैं एक जज पर 100 जजों का बोझ आ जाता है नतीजा आप कोर्ट जाते हैं और आपको सिर्फ अगली तारीख मिलती है

एक वास्तविक लगने वाला उदाहरण देखिए उत्तर प्रदेश के एक जिले में 5000 चेक बाउंस के केस हैं लेकिन वहां जज सिर्फ दो हैं। अब आप ही बताइए क्या वह जज हर फाइल को ठीक से पढ़ पाएगा जस्टिस ओक कहते हैं कि इस मशीनी रवैये के कारण न्याय की आत्मा मर रही है

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कानूनी ढांचा — Law Explained Like a Friend

भारत में जजों की नियुक्ति का अपना एक अनोखा तरीका है जिसे कॉलेजियम सिस्टम कहा जाता है इसे ऐसे समझिए जैसे किसी प्राइवेट कंपनी में प्रमोशन के लिए सीनियर डायरेक्टर्स का एक बोर्ड फैसला करता है

कॉलेजियम सिस्टम (Collegium System) — भारतीय न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया सरल भाषा में: यह सुप्रीम कोर्ट के टॉप 5 जजों का एक समूह है जो तय करता है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कौन जज बनेगा। इसका मतलब आपके लिए: अगर कॉलेजियम ने किसी का नाम भेजा और सरकार ने उसे रोक लिया तो अदालत में जज की कुर्सी खाली रहेगी और आपका केस पेंडिंग पड़ा रहेगा

जस्टिस ओक ने स्पष्ट किया कि नए कानून जैसे BNSS 2023 आने से प्रक्रियाएं तो बदली हैं, लेकिन जब तक इन कानूनों को लागू करने वाले जजों की संख्या नहीं बढ़ेगी, तब तक ज़मीनी बदलाव मुश्किल है


अदालतों की हालत: 5 बड़े कारण क्यों आपको इंसाफ नहीं मिल रहा

जस्टिस ओक के भाषण के आधार पर, ये वो 5 चरण या रुकावटें हैं जो सिस्टम को धीमा कर रही हैं:

  1. फाइलों पर कुंडली मारकर बैठना: कॉलेजियम नाम भेजता है लेकिन सरकार महीनों तक जवाब नहीं देती। इससे काबिल वकील जज बनने से कतराने लगे हैं
  2. ट्रायल कोर्ट की अनदेखी: हम हमेशा सुप्रीम कोर्ट की बात करते हैं, लेकिन जस्टिस ओक ने कहा कि असली लड़ाई 'निचली अदालतों' (Trial Courts) में है, जिन्हें हम गलत तरीके से निचली कहते हैं। ये वो अदालतें हैं जहाँ आम आदमी सबसे पहले जाता है
  3. जजों और आबादी का खराब अनुपात: विकसित देशों के मुकाबले भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर जजों की संख्या बहुत ही कम है। एक मजिस्ट्रेट दिन भर में 150 हाज़िरी लेता है, उसके पास केस सुनने का वक्त कहाँ है
  4. इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव: कई राज्यों में पद तो बना दिए गए लेकिन जजों के बैठने के लिए कोर्टरूम ही नहीं हैं। बिना कमरों के इंसाफ कैसे होगा
  5. गलत प्राथमिकताएं: कोर्ट अब कमर्शियल केस बड़ी कंपनियों के विवाद को वर्ल्ड बैंक रैंकिंग सुधारने के चक्कर में ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं जबकि एक गरीब मज़दूर या पेंशनभोगी का केस पीछे छूट जाता है

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हाल के मामले और सुप्रीम कोर्ट का रुख

जस्टिस ओक ने के.ए. नजीब मामले का ज़िक्र किया।

केस का नाम

वर्ष

मुख्य फैसला

के.ए. नजीब बनाम भारत संघ

2021

लंबे समय तक बिना ट्रायल जेल में रखना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

इस फैसले का महत्व: जस्टिस ओक ने दुख जताया कि इस तरह के स्पष्ट फैसलों के बावजूद, आज भी लोगों को छोटी सी ज़मानत के लिए सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ना पड़ता है क्योंकि मजिस्ट्रेट स्तर पर जज डरते हैं या सिस्टम उन्हें राहत देने की अनुमति नहीं देता


 सज़ा और दंड — जजों की कमी का दंड किसे

यहां सज़ा किसी अपराधी को नहीं बल्कि उस विचाराधीन कैदी को मिल रही है जिसका फैसला ही नहीं हो पा रहा

स्थिति

परिणाम

क्या यह न्याय है?

जज की सीट खाली

तारीख पर तारीख

नहीं, यह कानूनी उत्पीड़न है

बेल की अर्जी पेंडिंग

जेल में सज़ा से ज्यादा वक्त

नहीं, यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है

चेक बाउंस का बोझ

व्यापार और भरोसा खत्म

नहीं, यह आर्थिक नुकसान है


गलतियां जो हम और सिस्टम करते हैं

गलती 1: सिर्फ ऊपरी अदालतों पर ध्यान देना हम सोचते हैं कि सुप्रीम कोर्ट सब ठीक कर देगा

सही तरीका: जस्टिस ओक के अनुसार जब तक हम ट्रायल को' को मज़बूत नहीं करेंगे और वहां के जजों को बेहतर सुविधाएं नहीं देंगे, सिस्टम नहीं सुधरेगा

गलती 2: AI को मसीहा मानना कई लोग सोचते हैं कि Artificial Intelligence जजों की जगह ले लेगा

सही तरीका: जस्टिस ओक ने साफ कहा कि AI गवाह की मानसिकता नहीं पढ़ सकता वह सिर्फ अनुवाद और रिसर्च में मदद कर सकता है फैसला इंसान को ही करना होगा

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 एक्सपर्ट की राय: जस्टिस अभय ओक के शब्द

हमें आम आदमी से जुड़े मुकदमों में भारत की रैंकिंग के बारे में चिंतित होने की ज़रूरत है न कि सिर्फ वर्ल्ड बैंक की कमर्शियल लिस्ट के बारे में

मेरी व्याख्या: एक पत्रकार के तौर पर मैंने देखा है कि कैसे कॉर्पोरेट केसों के लिए स्पेशल बेंच बन जाती हैं लेकिन एक बूढ़े पिता की अपने बेटे के खिलाफ गुहार सालों साल दबी रहती है जस्टिस ओक का यह कहना कि 'कमर्शियल केसों को प्राथमिकता देना गलत है' एक बहुत बड़ा साहसी बयान है


आप क्या करें: व्यावहारिक सलाह

अगर आपका केस भी सालों से अटका हुआ है, तो ये कदम उठाएं:

  1. Legal Aid: अगर वकील महंगा है, तो जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण DLSA से मदद लें
  2. Section 436A BNSS: अगर आप अपनी संभावित सज़ा का आधा समय जेल में बिता चुके हैं तो आप तुरंत ज़मानत के हकदार हैं
  3. National Judicial Data Grid: अपने केस का स्टेटस ऑनलाइन चेक करें और देखें कि देरी जज की वजह से है या वकील की

 निष्कर्ष क्या उम्मीद बाकी है

जस्टिस अभय ओक का यह संबोधन एक चेतावनी भी है और एक उम्मीद भी जब सिस्टम के अंदर बैठा व्यक्ति कमियों को स्वीकार करता है तभी सुधार का रास्ता खुलता है इंसाफ सिर्फ कानून की किताबों में नहीं बल्कि कोर्ट की खाली पड़ी कुर्सियों को भरने और उस आखिरी आदमी की सुनने में है जो सालों से अपनी चप्पलें घिस रहा है

इंसाफ में देरी, इंसाफ न मिलना ही है यह कहावत अब बदलनी चाहिए हमें एक ऐसी न्यायपालिका चाहिए जो विकसित भारत की फाइलों में नहीं बल्कि आम हिंदुस्तानी की आंखों में चमक बनकर दिखे


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1: जजों की नियुक्ति में देरी का आम आदमी पर क्या असर पड़ता है

A: जब जजों की सीटें खाली होती हैं, तो केस का बोझ बढ़ जाता है। इससे आपकी तारीखें लंबी हो जाती हैं, ज़मानत मिलने में महीनों लग जाते हैं और न्याय मिलने की लागत (वकील की फीस आदि) बढ़ जाती है

Q2: क्या AI आने से कोर्ट के केस जल्दी निपटेंगे

A: जस्टिस ओक के अनुसार, AI केवल अनुवाद और दस्तावेजों की जांच में मदद कर सकता है। गवाहों की जिरह और जटिल कानूनी फैसलों के लिए इंसानी दिमाग और संवेदना की जरूरत हमेशा रहेगी

Q3: कॉलेजियम सिस्टम क्या है और विवाद क्यों है

A: यह जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की प्रणाली है विवाद तब होता है जब कॉलेजियम नाम भेजता है और सरकार उन नामों को बिना किसी ठोस कारण के महीनों तक लटकाए रखती है

Q4: अगर मजिस्ट्रेट बेल न दे, तो क्या करना चाहिए

A: जस्टिस ओक ने चिंता जताई है कि मजिस्ट्रेट अक्सर बेल देने से डरते हैं ऐसी स्थिति में आपको हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ता है, जो कि के.ए. नजीब मामले के अनुसार आपका अधिकार है

Q5: ट्रायल कोर्ट को 'निचली अदालत' कहना क्यों गलत है

A: क्योंकि ये अदालतें न्यायपालिका की बुनियाद हैं शादी, संपत्ति और आपराधिक मामलों का सबसे पहला सामना यहीं होता है इन्हें कमतर आंकने से पूरा सिस्टम कमज़ोर होता है

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नाज़िम
नाज़िम

नाज़िम livedastak.com के एक कुशल और समर्पित लेखक हैं, जिन्हें Crime & Law विषयों पर लेखन का लगभग 3 वर्षों का अनुभव है। वे अपराध और कानून से जुड़े जटिल एवं संवेदनशील मुद्दों पर गहन शोध के आधार पर सटीक, प्रमाणिक और संतुलित जानकारी प्रस्तुत करते हैं। उनकी लेखन शैली स्पष्ट, तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक है, जिससे पाठकों को कठिन कानूनी विषय भी सरलता से समझ में आते हैं। नाज़िम का उद्देश्य है कि पाठकों तक ताज़ा, विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी सरल हिंदी में पहुँचे, ताकि वे जागरूक और सूचित रह सकें। उनके लेख निष्पक्षता, तथ्यों की प्रा…

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