जस्टिस अभय ओका का बयान: क्यों तारीख-पर-तारीख आपकी नियति बन चुकी है?
रात के दो बज रहे थे रमेश अपनी फाइलें समेटे अदालत के बाहर लगे बेंच पर बैठा था दस साल हो गए। उसकी ज़मीन का केस आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है जहाँ से शुरू हुआ था रमेश अकेला नहीं है भारत की हर अदालत के बाहर आपको ऐसे हजारों 'रमेश' मिल जाएंगे जो न्याय की उम्मीद में बूढ़े हो रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस. ओका ने इस दर्द की नस पर हाथ रखा है। उन्होंने जो कहा वह किसी भी आम नागरिक की नींद उड़ाने के लिए काफी है क्या आप जानते हैं कि जिस न्याय के लिए आप सालों भटक रहे हैं उसकी असली रुकावट कानून नहीं बल्कि कुर्सी खाली होना है?
लेकिन बात सिर्फ कुर्सियों की नहीं है बात उस सिस्टम की है जो अंदर ही अंदर चरमरा रहा है चलिए समझते हैं कि जस्टिस ओका ने देश की न्याय प्रणाली के बारे में कौन सा कड़वा सच दुनिया के सामने रखा है
पृष्ठभूमि: आखिर क्यों यह मुद्दा आपकी जिंदगी से जुड़ा है?
जब हम जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है कहते हैं, तो यह सिर्फ एक मुहावरा नहीं होता। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड NJDG के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं जस्टिस ओका ने याद दिलाया कि साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने एक लक्ष्य रखा था हर 10 लाख की आबादी पर 50 जज होने चाहिए
आज हम 2026 में खड़े हैं, और हकीकत क्या है? जस्टिस ओका के अनुसार, आज भी यह आंकड़ा महज 22 से 23 जजों पर सिमटा हुआ है। यानी जितनी आबादी बढ़ी, जितनी पेचीदगियां बढ़ीं, उस हिसाब से जज नहीं बढ़े। मैंने अपनी 15 साल की वकालत में देखा है कि एक-एक जज के पास दिन भर में 100 से ज्यादा केस लिस्ट होते हैं क्या एक इंसान के लिए 5-6 घंटों में 100 परिवारों की किस्मत का सही फैसला करना मुमकिन है? शायद नहीं। और यहीं से शुरू होता है तारीखों का अंतहीन सिलसिला।
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कानूनी ढांचा: क्या कहता है हमारा संविधान और सिस्टम?
संविधान का अनुच्छेद 21 हमें त्वरित न्याय का मौलिक अधिकार देता है लेकिन जब मैदान में खिलाड़ी ही कम हों, तो खेल समय पर खत्म कैसे होगा?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 — यह नया कानून अब दंड प्रक्रिया संहिता की जगह ले चुका है।
सरल भाषा में: इसमें कई मामलों के लिए समय सीमा तय की गई है।
इसका मतलब आपके लिए: कानून तो कह रहा है कि काम जल्दी हो, लेकिन बिना जजों के ये डेडलाइन सिर्फ कागजी बनकर रह जाएंगी।
जस्टिस ओका ने साफ किया कि जब तक इंफ्रास्ट्रक्चर और मैनपावर नहीं बढ़ेगी नए कानून भी पुराने ढर्रे पर ही चलेंगे। मान लीजिए आप एक बहुत बड़ी कंपनी चला रहे हैं और काम 100 लोगों का है, लेकिन आपने सिर्फ 10 कर्मचारी रखे हैं। क्या आप समय पर डिलीवरी दे पाएंगे? न्यायपालिका के साथ भी ठीक यही हो रहा है।
स्टेप-बाय-स्टेप: देरी के 5 मुख्य कारण और जस्टिस ओका का नजरिया
जस्टिस ओका ने बड़ी बेबाकी से उन बाधाओं को गिनाया है जो ट्रायल को धीमा करती हैं:
चरण 1: जजों की नियुक्ति में भारी देरी सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम नाम भेजता है लेकिन सरकार उन फाइलों पर 9 से 12 महीने तक बैठी रहती है। सबसे बड़ी गलती: योग्य वकील इस देरी की वजह से जज बनने से कतराने लगे हैं।
चरण 2: आबादी और मुकदमों का अनुपात जैसे-जैसे साक्षरता और जागरूकता बढ़ी है केस फाइलिंग भी बढ़ी है। लेकिन बेंच की संख्या वही पुरानी है।
चरण 3: खराब जेल स्थितियां और अंडरट्रायल कैदी जस्टिस ओका ने कहा कि जेलों में बंद आधे से ज्यादा लोग वो हैं जिनका गुनाह साबित नहीं हुआ है। सिर्फ ट्रायल में देरी की वजह से वे सालों जेल में काट रहे हैं।
चरण 4: टेक्नोलॉजी का अधूरा इस्तेमाल हालांकि NJDG जैसे प्लेटफॉर्म आए हैं लेकिन जब तक डेटा दुनिया के सामने है हमारी छवि एक धीमी न्याय प्रणाली वाली बनी रहेगी।
चरण 5: बार संगठनों की चुप्पी जस्टिस ओका ने अधिवक्ता परिषद से अपील की है कि वे सरकार से जवाब मांगें। वकीलों को सिर्फ कोर्ट रूम तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
हाल के मामले: क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का रुख?
इम्तियाज अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य | 2012/2017 | सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोर्ट ने साफ कहा था कि ट्रायल में देरी मौलिक अधिकारों का हनन है। जस्टिस ओका ने इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अगर अब भी नहीं जागे, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की न्याय व्यवस्था पर सवाल उठेंगे। विदेशी निवेशक भी ऐसे देश में आने से डरते हैं जहाँ विवाद सुलझाने में 20 साल लग जाते हैं। इस फैसले के बाद से दबाव तो बना है, लेकिन जमीन पर जजों की संख्या नहीं बढ़ी।
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सज़ा और स्थिति: जेलों का बोझ
स्थिति | प्रभाव | समाधान (जस्टिस ओका के अनुसार) |
|---|---|---|
लंबित केस | 5 करोड़+ | जजों की संख्या दोगुनी करना |
अंडरट्रायल कैदी | क्षमता से अधिक जेलें | त्वरित जमानत और फास्ट ट्रैक ट्रायल |
नियुक्ति में देरी | 1 साल तक का इंतज़ार | कॉलेजियम और सरकार में समन्वय |
सज़ा सिर्फ मुजरिम को नहीं मिलती, ट्रायल में देरी की वजह से निर्दोष परिवार भी मानसिक और आर्थिक सज़ा भुगतते हैं।
3 गलतियां जो आम आदमी करता है
न्याय में देरी सिर्फ सिस्टम की वजह से नहीं, कभी-कभी हमारी गलतियों से भी होती है:
गलती 1: बिना तैयारी के कोर्ट जाना अक्सर लोग बिना जरूरी दस्तावेजों के पेशी पर जाते हैं, जिससे जज को अगली तारीख देनी पड़ती है। सही तरीका: हर पेशी से पहले अपने वकील के साथ फाइल की समीक्षा करें।
गलती 2: मध्यस्थता को नकारना हम सोचते हैं कि जज ही फैसला करेगा तभी जीत होगी। सही तरीका: छोटे विवादों को कोर्ट के बाहर 'लोक अदालत' या मेडिएशन से सुलझाएं।
गलती 3: केस स्टेटस ट्रैक न करना लोग सब कुछ वकील पर छोड़ देते हैं। सही तरीका: ई-कोर्ट ऐप का इस्तेमाल करें और खुद स्टेटस देखें।
एक्सपर्ट की राय: मेरा निजी अनुभव
मैंने अदालतों के गलियारों में वकीलों को जज की कुर्सी खाली होने पर मायूस लौटते देखा है। जस्टिस ओका की चिंता जायज है। जब एक जज के पास 100 फाइलें होंगी, तो वह सिर्फ 'तारीख' दे सकता है, न्याय नहीं। जैसा कि दिल्ली हाईकोर्ट के कई वरिष्ठ वकीलों का मानना है, न्यायपालिका को बजट का उतना हिस्सा नहीं मिलता जितना उसे मिलना चाहिए। मेरा मानना है कि न्याय को प्रायोरिटी बनाना होगा, फॉर्मेलिटी नहीं।
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निष्कर्ष: अब आगे क्या?
जस्टिस अभय ओका का बयान एक चेतावनी की तरह है। यह सिर्फ सरकार के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी है अगर सिस्टम में जजों की कमी पूरी नहीं हुई तो आम आदमी का विश्वास न्यायपालिका से उठ जाएगा। यह सफर आसान नहीं था और न ही रमेश जैसे हजारों लोगों के लिए यह खबर राहत देने वाली है लेकिन सच को स्वीकार करना सुधार की पहली सीढ़ी है।
अगली बार जब आप कोर्ट जाएं और तारीख मिले, तो याद रखिएगा कि गलती उस जज की नहीं, उस खाली कुर्सी की है जिसे भरा नहीं गया।
क्या आपको भी लगता है कि जजों की संख्या बढ़ाने से आपकी परेशानी खत्म हो जाएगी? अपनी राय नीचे कमेंट में साझा करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1: भारत में जजों की कमी का मुख्य कारण क्या है?
A: मुख्य कारण आबादी के अनुपात में स्वीकृत पदों का कम होना और सरकार द्वारा जजों की नियुक्ति कॉलेजियम की सिफारिशों को मंजूरी देने में 9 से 12 महीने तक की देरी करना है। 2002 के लक्ष्य के मुकाबले हम आज भी आधे से कम जजों के साथ काम कर रहे हैं।
Q2: क्या नए कानून (BNSS) से ट्रायल की देरी कम होगी?
A: कानून में समय सीमा तय की गई है, लेकिन जस्टिस ओका के अनुसार जब तक जजों की संख्या नहीं बढ़ेगी, तब तक इन नियमों को जमीन पर लागू करना बहुत मुश्किल होगा।
Q3: एक आम आदमी लंबित केस के लिए क्या कर सकता है?
A: आप अपने वकील के माध्यम से Speedy Trial के लिए आवेदन कर सकते हैं या मामले को लोक अदालत में ले जा सकते हैं।
Q4: जजों की कमी से आम कैदियों पर क्या असर पड़ता है?
A: ट्रायल में देरी के कारण निर्दोष लोग भी सालों जेल में अंडरट्रायल के रूप में बिता देते हैं, जिससे उनकी जिंदगी और मानवाधिकारों का हनन होता है।
Q5: नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) क्या है?
A: यह एक ऑनलाइन पोर्टल है जहाँ देश भर की अदालतों के लंबित और निपटाए गए मामलों का रियल-टाइम डेटा उपलब्ध रहता है, जिससे सिस्टम की पारदर्शिता बढ़ती है।