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पत्नी भरण-पोषण कानून 2026: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पति को देना होगा इतना खर्च

मार्च 31, 2026, 12:39 बजे
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पत्नी भरण-पोषण कानून 2026: इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पति को देना होगा इतना खर्च

18 साल की शादी, 2 साल की कानूनी लड़ाई और एक ऐसा फैसला जिसने कानून की किताबों मेंइंसानियत का रंग भर दिया

शाम के समय में जब शुभांगी कोर्ट के गलियारे से बाहर निकल रही थी तो उसके पैरों में वो भारीपन नहीं था जो अक्सर तारीखों पर होता है उसके सामने उसका अपना पति अकुल था जो इस बात पर अड़ा था कि शुभांगी को जेल भेज दिया जाए क्योंकि उसने बैंक बैलेंस की पूरी जानकारी नहीं दी अकुल का तर्क था कि इसने झूठ बोला है इसने कोर्ट को गुमराह किया है लेकिन क्या सिर्फ कुछ तथ्यों को न बताना झूठ की श्रेणी में आता है क्या एक पति का अपनी पत्नी के प्रति उत्तरदायित्व केवल उसकी सांसें चलने तक ही सीमित है

इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने इन कड़वे सवालों के बड़े मीठे जवाब दिए हैं वकील होने के नाते मैंने अपनी प्रैक्टिस में सैकड़ों ऐसे पति देखे हैं जो मेंटेनेंस से बचने के लिए पत्नी को मुजरिम साबित करने पर तुल जाते हैं लेकिन जस्टिस अरिंदम सिन्हा की बेंच ने जो कहा वो हर उस शख्स को पढ़ना चाहिए जो कानून को केवल सजा देने का जरिया समझता है यह कहानी सिर्फ एक केस की नहीं बल्कि उस सुरक्षा कवच की है जो भारत का कानून एक महिला को देता है


पृष्ठभूमि: क्यों यह फैसला हर घर की कहानी है

भारत में हर साल लाखों भरण-पोषण के मामले दर्ज होते हैं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि पारिवारिक विवादों में सबसे ज्यादा खींचतान पैसों को लेकर ही होती है लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं वकील साहब क्या पत्नी अमीर हो तो भी उसे पैसा देना पड़ेगा या अगर उसने कुछ छुपाया है, तो क्या केस खत्म हो जाएगा

असल में, हमारे समाज में एक धारणा बन गई है कि अगर पत्नी के पास थोड़े भी पैसे हैं तो पति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गया अकुल रस्तोगी बनाम शुभांगी रस्तोगी के इस मामले में भी यही हुआ पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने अपने बैंक में मौजूद 20 लाख रुपये की एफडी की बात छिपाई और खुद को बेरोजगार बताया। उसने इसे झूठी गवाही का नाम दिया लेकिन अदालत ने इसे उस नजरिए से देखा जिससे अक्सर समाज अपनी आंखें फेर लेता है-वो नजरिया था उत्तरदायित्व का। इससे पहले कि हम कोर्ट की गहराई में उतरें हमें यह समझना होगा कि कानून की नजर में पति का दर्जा क्या है

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कानूनी ढांचा: कानून की भाषा, वकील दोस्त की जुबानी

भरण-पोषण का कानून किसी को गरीब बनाने के लिए नहीं, बल्कि किसी को सड़क पर आने से बचाने के लिए बना है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में Section 125 CrPC अब बीएनएसएस के तहत प्रावधान और हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम की मूल आत्मा को छुआ है

मान लीजिए आप एक जहाज के कैप्टन हैं। अगर जहाज बीच समुद्र में खराब हो जाए, तो क्या आप लाइफबोट लेकर अकेले भाग सकते हैं नहीं आपकी जिम्मेदारी उन लोगों की भी है जो आपके साथ सवार थे

कोर्ट ने जो समझाया, उसे इस तरह समझिए

पति का दायित्व (Husband's Liability) — कानून के अनुसार सरल भाषा में: पति अपनी पत्नी को आर्थिक सहारा देने के लिए कानूनी और नैतिक रूप से बाध्य है। इसका मतलब आपके लिए: चाहे आप अलग रह रहे हों या तलाक की प्रक्रिया चल रही हो, पत्नी का पेट पालना आपकी जिम्मेदारी है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कदम आगे बढ़कर कहा कि यह जिम्मेदारी पति की मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं होती अगर पति नहीं रहा, तो विधवा अपने ससुर से भी भरण-पोषण की मांग कर सकती है। यानी यह एक निरंतर दायित्व है


स्टेप-बाय-स्टेप: क्या जानकारी छिपाना झूठ है

हाईकोर्ट ने इस मामले में 5 मुख्य बिंदुओं पर अपनी बात रखी है जिन्हें समझना आपके लिए बेहद जरूरी है

चरण 1: नकारात्मक साबित करने का भार अकुल ने कहा कि शुभांगी कामकाजी है। कोर्ट ने कहा—साबित करो! आप पत्नी को यह साबित करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते कि वह बेरोजगार है। अगर आप आरोप लगा रहे हैं, तो सबूत भी आप ही देंगे बड़ी गलती: लोग अक्सर बिना सबूत के कोर्ट में सिर्फ बोल देते हैं कि वह तो ट्यूशन पढ़ाती है। बिना रसीद या बैंक स्टेटमेंट के यह बात बेकार है

चरण 2: दस्तावेजों की समग्रता कोर्ट ने साफ किया कि अगर आप किसी डॉक्यूमेंट जैसे बैंक स्टेटमेंट को सबूत के तौर पर पेश कर रहे हैं, तो आप उसका सिर्फ वो हिस्सा नहीं चुन सकते जो आपके फायदे का हो। आपको पूरा डॉक्यूमेंट स्वीकार करना होगा।

चरण 3: 'छिपाना' बनाम झूठ बोलना कोर्ट ने एक ऐतिहासिक लाइन कही—किसी जानकारी को छिपाना अपने आप में झूठा बयान देना नहीं है जब तक यह साबित न हो कि छिपाने का मकसद न्याय को पूरी तरह बाधित करना था तब तक इसे 'झूठी गवाही' नहीं माना जाएगा

चरण 4: रजनीश बनाम नेहा गाइडलाइंस 2021 के इस मशहूर फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति का हलफनामा देना होगा। पति ने इसी का सहारा लिया, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी ने एफडी के पैसे अपनी जरूरतों के लिए पहले ही निकाल लिए हैं तो उसे अपराधी नहीं माना जा सकता

यकीन मानिए कानून आपकी नीयत देखता है सिर्फ फाइलें नहीं


हाल के मामले और मिसालें: अकुल रस्तोगी बनाम शुभांगी रस्तोगी (2026)

केस का नाम

न्यायालय

मुख्य फैसला

अकुल रस्तोगी vs शुभांगी रस्तोगी

इलाहाबाद हाईकोर्ट (2026)

जानकारी छिपाना हमेशा 'झूठी गवाही' नहीं होती।

रजनीश vs नेहा

सुप्रीम कोर्ट (2021)

संपत्ति का खुलासा अनिवार्य है, पर मानवीय आधार सर्वोपरि है।

इस फैसले के बाद से अब उन पतियों के लिए मुश्किल खड़ी हो गई है जो छोटी-छोटी तकनीकी कमियों को लेकर पत्नी पर केस ठोक देते थे। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि अगर पति पैसा नहीं दे रहा और पत्नी अपने पिता द्वारा दी गई एफडी से घर चला रही है तो वह उसकी संपत्ति नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी है

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सज़ा और दंड: झूठी गवाही का डर कितना सच

अक्सर लोग एक-दूसरे को डराते हैं कि "मैं तुम पर 340 (अब नई धाराओं के तहत) का केस कर दूंगा।" आइए इसकी हकीकत देखें:

अपराध

धारा (BNS/CrPC)

अधिकतम सज़ा

जमानत योग्य?

झूठी गवाही (Perjury)

Sec 229 BNS

7 साल तक

नहीं (गंभीर मामलों में)

झूठा हलफनामा

Sec 193 IPC / 229 BNS

3 साल तक

हाँ

लेकिन एक बात ध्यान रखें: कोर्ट बहुत कम मामलों में पत्नी के खिलाफ ऐसी कार्यवाही की अनुमति देता है, खासकर भरण-पोषण के मामलों में। कोर्ट का मुख्य लक्ष्य 'न्याय' है, 'बदला' नहीं


गलतियां जो लोग अक्सर करते हैं

हम सब जज्बात में आकर ये गलतियां कर बैठते हैं:

गलती 1: आय छिपाना लोग सोचते हैं कि सैलरी स्लिप छुपा लेंगे तो मेंटेनेंस कम देना पड़ेगा

सही तरीका: कोर्ट अब आपके लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया से भी आपकी कमाई का अंदाजा लगा लेती है। सच बताना हमेशा बेहतर है।

गलती 2: हर बात को 'झूठ' बताना विपक्ष की हर छोटी गलती पर Perjury की अर्जी लगाना

सही तरीका: केवल उन बातों पर आपत्ति जताएं जिनका असर फैसले पर पड़ सकता है। कोर्ट का समय बर्बाद करने पर आपको जुर्माना लग सकता है


Expert की राय: क्या कहते हैं कानून के जानकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले पर वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि यह फैसला 'न्यायिक सहानुभूति' का उत्कृष्ट उदाहरण है

कोर्ट ने यह पहचान लिया है कि एक महिला जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है उससे यह उम्मीद करना कि वह हर एक पैसे का हिसाब सटीक रखेगी जबकि उसे पति से सहयोग न मिल रहा हो थोड़ा अव्यावहारिक है

मेरी नजर में यह फैसला पतियों को यह संदेश देता है कि कानूनी दांव-पेंच से आप अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते


आप क्या करें: व्यावहारिक गाइड

अगर आप ऐसी किसी स्थिति में हैं, तो ये कदम उठाएं:

  1. बैंक ट्रांजेक्शन पारदर्शी रखें: अगर आपने एफडी से पैसे निकाले हैं, तो उसकी रसीदें संभाल कर रखें
  2. ससुराल से मदद: यदि आप विधवा हैं, तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत अपने अधिकारों को जानें
  3. हेल्पलाइन: किसी भी कानूनी उलझन के लिए 181 महिला हेल्पलाइन या अपने जिले की 'लीगल एड क्लिनिक' से संपर्क करें

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भविष्य की राह: कानून का मानवीय चेहरा

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला हमें याद दिलाता है कि कानून केवल शब्दों का जाल नहीं है यह समाज को जोड़े रखने वाला धागा है अकुल और शुभांगी के मामले में कोर्ट ने केवल एक अर्जी खारिज नहीं की बल्कि उन हजारों महिलाओं को हिम्मत दी है जो इस डर में जीती हैं कि कहीं एक छोटी सी गलती उन्हें जेल न पहुंचा दे

कानून कहता है कि पति-पत्नी का रिश्ता टूटने के बाद भी इंसानियत का रिश्ता बना रहना चाहिए अगर आप इस वक्त किसी कानूनी लड़ाई में हैं तो याद रखिए-सच्चाई केवल वो नहीं जो कागजों पर लिखी है बल्कि वो है जो आपकी नीयत में है

क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि कानूनी पेचीदगियों की वजह से आपको हक मिलने में देरी हुई अपनी कहानी नीचे शेयर करें


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q1: क्या कामकाजी पत्नी को भी भरण-पोषण मिलता है

A: हाँ, यदि उसकी आय उसके मौजूदा जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट दोनों की आय के अंतर को देखता है ताकि पत्नी उसी गरिमा के साथ जी सके जैसा वह ससुराल में जीती थी

Q2: अगर पत्नी कोर्ट में अपनी आय छिपाती है, तो क्या होगा

A: इलाहाबाद हाईकोर्ट के अनुसार हर बार जानकारी छिपाना 'झूठी गवाही नहीं है हालांकि, यदि वह जानबूझकर बड़े निवेश छिपाती है तो कोर्ट उसके मेंटेनेंस की राशि कम कर सकता है या याचिका खारिज कर सकता है

Q3: क्या ससुर से भरण-पोषण मांगना कानूनी रूप से सही है

A: बिल्कुल हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 19 के तहत, एक विधवा अपनी ससुर से भरण-पोषण की मांग कर सकती है, बशर्ते उसके पास अपनी कोई आय न हो

Q4: झूठी गवाही साबित करने के लिए क्या चाहिए

A: आपको यह साबित करना होगा कि सामने वाले ने जानबूझकर ऐसा झूठ बोला जिससे कोर्ट का फैसला पूरी तरह बदल सकता था। महज छोटी-मोटी चूक को झूठा साक्ष्य नहीं माना जाता

Q5: मेंटेनेंस का केस कितने समय में तय होता है

A: कानूनन तो इसे 60 दिनों के भीतर तय होना चाहिए Interim Maintenance, लेकिन व्यवहार में इसमें 6 महीने से एक साल तक का समय लग सकता है

Q6: क्या मुझे हर छोटे मामले के लिए वकील की जरूरत है

A: हालांकि आप अपना पक्ष खुद रख सकते हैं, लेकिन भरण-पोषण जैसे संवेदनशील मामलों में एक अनुभवी वकील की सलाह जरूरी है ताकि आप तकनीकी गलतियों जैसे हलफनामे में चूक से बच सकें

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नाज़िम
नाज़िम

नाज़िम livedastak.com के एक कुशल और समर्पित लेखक हैं, जिन्हें Crime & Law विषयों पर लेखन का लगभग 3 वर्षों का अनुभव है। वे अपराध और कानून से जुड़े जटिल एवं संवेदनशील मुद्दों पर गहन शोध के आधार पर सटीक, प्रमाणिक और संतुलित जानकारी प्रस्तुत करते हैं। उनकी लेखन शैली स्पष्ट, तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक है, जिससे पाठकों को कठिन कानूनी विषय भी सरलता से समझ में आते हैं। नाज़िम का उद्देश्य है कि पाठकों तक ताज़ा, विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी सरल हिंदी में पहुँचे, ताकि वे जागरूक और सूचित रह सकें। उनके लेख निष्पक्षता, तथ्यों की प्रा…

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