खिड़की के बाहर अंधेरा था लेकिन अमृतलाल जी की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था हाथ में पकड़े मोबाइल की स्क्रीन पर बार-बार एक ही ईमेल रिफ्रेश कर रहे थे शायद सरकार की तरफ से कोई खबर आ जाए उनके 25 साल के बेटे दीक्षित की तस्वीर दीवार पर टंगी थी जिसे ओमान के तट पर एक ड्रोन हमले ने हमेशा के लिए खामोश कर दिया। एक पिता के लिए इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि महीना बीत गया पर उसे अपने बेटे का शव तक नसीब नहीं हुआ यह कहानी सिर्फ एक परिवार के दुख की नहीं है यह हमारी कानूनी व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल की उस सुस्ती की है जो एक आम इंसान को 'लाचार' बना देती है
आज जब हम यह खबर पढ़ रहे हैं तो सवाल सिर्फ एक शव को वापस लाने का नहीं है सवाल उन हजारों युवाओं की सुरक्षा और सम्मान का है जो विदेशी समंदरों में देश की अर्थव्यवस्था का चक्का घुमाते हैं क्या एक भारतीय नागरिक की जान और उसके बाद मिलने वाला सम्मान सिर्फ कागजी कार्यवाही में उलझ कर रह जाएगा
पृष्ठभूमि: यह मुद्दा क्यों हर भारतीय के लिए मायने रखता है
जब हम ब्लू इकोनॉमी की बात करते हैं तो हम भूल जाते हैं कि इसके पीछे दीक्षित जैसे हजारों नाविकों का खून-पसीना लगा है ओमान के तट पर हुआ यह हमला कोई साधारण दुर्घटना नहीं थी यह पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का नतीजा था NCRB के आंकड़े शायद समुद्र में होने वाली मौतों का सटीक हिसाब न दें लेकिन विदेश मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि हर साल सैकड़ों भारतीय नाविक विदेशी जलक्षेत्र में अपनी जान गंवाते हैं
अमृतलाल और मिताली दीक्षित की बहन ने जब बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो उन्होंने सिर्फ अपने भाई के लिए नहीं बल्कि हर उस परिवार के लिए आवाज उठाई है जो सिस्टम की लालफीताशाही का शिकार है वी शिप्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड जैसी बड़ी कंपनियां और मंत्रालय जब एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते हैं तो वह केवल समय नहीं बर्बाद करते बल्कि एक परिवार की बची-कुची उम्मीदों को भी मार देते हैं
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कानूनी ढांचा: क्या कहता है हमारा कानून और संविधान
एक वकील के तौर पर मैंने देखा है कि लोग अक्सर सोचते हैं कि मरने के बाद कानून खत्म हो जाता है लेकिन भारत का संविधान ऐसा नहीं मानता आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार। सरल भाषा में: यह अधिकार सिर्फ जीवित रहने तक सीमित नहीं है। इसका मतलब आपके लिए: सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में साफ किया है कि गरिमा के साथ अंतिम संस्कार का अधिकार भी अनुच्छेद 21 का हिस्सा है यानी अगर सरकार किसी नागरिक का शव वापस लाने में लापरवाही करती है तो वह उसके मौलिक अधिकारों का हनन है
इसके अलावा, Merchant Shipping Act, 1958 के तहत जहाजरानी कंपनियों की यह कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वे अपने कर्मचारियों की मृत्यु की स्थिति में शव को उनके घर तक पहुंचाएं और उचित मुआवजा दें नए भारतीय न्याय संहिता के दौर में भी नागरिक अधिकारों की यह मूल भावना नहीं बदली है
शव वापसी की कानूनी प्रक्रिया: स्टेप-बाय-स्टेप जानकारी
अगर भगवान न करे किसी के साथ ऐसा हो, तो कानूनी रास्ता क्या है यहाँ दीक्षित के परिवार ने जो किया और जो आपको जानना चाहिए
चरण 1: तत्काल सूचना और FIR जैसे ही घटना की जानकारी मिले संबंधित कंपनी और स्थानीय पुलिस अगर संभव हो को सूचित करें बड़ी गलती: लोग केवल कंपनी के भरोसे बैठे रहते हैं तुरंत विदेश मंत्रालय के मदद पोर्टल पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए
चरण 2: दूतावास से संपर्क संबंधित देश में स्थित भारतीय दूतावास को Death Certificate और Embalming के लिए दबाव बनाना होता है
चरण 3: Repatriation की मांग यह कंपनी का दायित्व है अगर कंपनी मना करे या देरी करे तो Directorate General of Shipping को पत्र लिखें
चरण 4: हाईकोर्ट में रिट याचिका जैसा सोलंकी परिवार ने किया जब सरकार और कंपनी न सुने तो अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट से परमादेश जारी करने की मांग करें यकीन मानिए जब अदालत हस्तक्षेप करती है, तो जो फाइलें महीनों से दबी होती हैं वे घंटों में चलने लगती हैं
हाल के मामले: जब कोर्ट ने दिया सहारा
- आशूरा बनाम भारत संघ 2020: दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि विदेशी धरती से शव वापस लाना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है
- परमानंद कटारा बनाम भारत संघ: इस ऐतिहासिक मामले में कोर्ट ने कहा था कि मृतक का शरीर भी सम्मान का हकदार है
इस मामले में भी बॉम्बे हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश वाली बेंच का रुख कड़ा रहने की उम्मीद है क्योंकि यहाँ मामला ड्रोन हमले यानी एक युद्ध जैसी स्थिति का है
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गलतियां जो पीड़ित परिवार अक्सर करते हैं
गलती 1: केवल फोन पर बात करना अधिकारी फोन पर आश्वासन देते हैं जिसका कोई कानूनी वजूद नहीं होता
सही तरीका: हमेशा ईमेल या लिखित पत्र भेजें और उसकी Received कॉपी रखें
गलती 2: कानूनी सलाह में देरी परिवार को लगता है कि कोर्ट जाने से मामला उलझ जाएगा
सही तरीका: 15 दिन से ज्यादा की देरी होने पर तुरंत वकील से मिलें
आप क्या करें: व्यावहारिक सलाह
अगर आप या आपके परिचित मर्चेंट नेवी में हैं तो ये 3 चीजें आज ही सुनिश्चित करें:
- Next of Kin (NOK) अपडेट रखें: कंपनी के रिकॉर्ड में सही वारिस का नाम हो
- कॉन्ट्रैक्ट की कॉपी: हमेशा अपने पास रखें जिसमें Repatriation क्लॉज हो
- मदद पोर्टल MADAD: इस सरकारी वेबसाइट के बारे में परिवार को बताएं
एक अधूरा विदा: व्यवस्था से सवाल
दीक्षित सोलंकी की बहन मिताली का कहना है कि उन्हें अंधेरे में रखा जा रहा है एक महीने बाद भी यह न पता होना कि शव कहां है और किस हाल में है आधुनिक भारत की डिजिटल प्रगति पर एक तमाचा है कानून अपनी जगह काम करेगा अदालत अपना फैसला सुनाएगी लेकिन क्या हम एक समाज के तौर पर इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि किसी के घर का चिराग बुझने के बाद उसकी मिट्टी भी उसे न सौंप सकें
यह लड़ाई सिर्फ दीक्षित के पार्थिव शरीर की नहीं है यह सिस्टम को आईना दिखाने की लड़ाई है उम्मीद है 6 अप्रैल को बॉम्बे हाईकोर्ट से वह आदेश निकलेगा जो इस परिवार के आंसू तो नहीं पोंछ पाएगा लेकिन उन्हें अपने बेटे को विदा करने का हक जरूर देगा
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1: क्या विदेशी जमीन पर मौत होने पर शव लाना सरकार की जिम्मेदारी है
A: हां, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक अंतिम संस्कार एक मौलिक अधिकार है सरकार का कर्तव्य है कि वह राजनयिक माध्यमों का उपयोग करके अपने नागरिक के पार्थिव शरीर को स्वदेश वापस लाने में हर संभव मदद करे
Q2: अगर शिपिंग कंपनी शव वापस लाने में आनाकानी करे तो क्या करें
A: सबसे पहले Directorate General of Shipping को शिकायत करें यदि 7-10 दिनों में समाधान न मिले तो हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करें
Q3: मर्चेंट नेवी में मृत्यु होने पर क्या परिवार मुआवजे का हकदार है
A: बिलकुल। यह मृतक के कॉन्ट्रैक्ट और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून पर निर्भर करता है। इसमें मृत्यु लाभ और बकाया वेतन शामिल होता है
Q4: कोर्ट केस में कितना समय लगता है
A: ऐसे संवेदनशील मामलों में कोर्ट अक्सर Urgent Hearing करता है और कुछ ही हफ्तों में आदेश पारित कर देता है
Q5: क्या कानूनी प्रक्रिया बहुत महंगी होती है
A: नहीं, मानवाधिकार और मौलिक अधिकारों से जुड़े मामलों में कई बार वकील प्रो-बोनो मुफ्त काम करते हैं या कानूनी सेवा प्राधिकरण से मदद ली जा सकती है