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मंदिर तोड़ देने से उसका अस्तित्व खत्म नहीं होता, बहस जारी

आदि विश्वेश्वर है ज्ञानवापी, शिवपुराण से लेकर मुगल आक्रांताओं के कारनामों तक का जिक्र कर बोले हिंदू पक्ष के वकील

-सुरेश गांधी

वाराणसी : ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी के दर्शन मामले की पोषणीयता मुद्दे पर गुरुवार को भी जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत में हिंदू पक्ष ने लगातार तीसरे दिन दलीलें दीं। कोर्ट ने बहस जारी रखते हुए सुनवाई की अगली तारीख 15 जुलाई तय की गई है। जारी बहस के दौरान हिंदू पक्ष की ओर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन और विष्णु शंकर जैन ने मजबूती से दलीलें पेश की। उनका कहना है कि मंदिर तोड़ देने से उसका अस्तित्व खत्म नहीं हो जाता। बता दें, पोषणीयता पर जिला जज अजय कृष्ण विश्वेश ने रोजाना सुनवाई की बात कही है। पोषणीयता पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार सबसे पहले फैसला आना है। अंजुमन इंतेजामिया कमेटी की ओर से दिए गए 52 बिंदुओं की आपत्ति पर एक-दो नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट की कई नजीरों और हिंदू लॉ का हवाला देते हुए विष्णु शंकर जैन ने कहा कि देवता की संपत्ति एक बार उनके पक्ष में निहित हो गई तब वह कभी समाप्त नहीं होगी। कयामत आने तक चलती रहेगी। इस संबंध में श्रीराम जन्मभूमि के केस में सुप्रीम कोर्ट की नजीर का भी हवाला दिया गया। बताया गया कि देवता की संपत्ति कभी नष्ट नहीं होती। उसका आध्यात्मिक स्वरूप बरकरार रहेगा। 1937 में बीएचयू के प्रोफेसर एएस एलटेकर ने अपनी पुस्तक में काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़े जाने का जिक्र किया है। ये भी लिखा है कि कि टूटने के बाद वहां क्या-क्या बचा और कहां पूजा हो रही है जो बरकरार है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हरिशंकर जैन ने शिव पुराण का जिक्र किया। शिव पुराण के मंत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस जगह पर मस्जिद के होने का दावा किया जा रहा है वह शिवपुराण के मुताबिक भगवान आदि विश्वेश्वर की है। श्रृंगार गौरी और अन्य विग्रहों के पूजा की जो मांग की जा रही है, वहां पर 1993 तक लगातार पूजन होता रहा था। इतना ही नहीं वक्फ बोर्ड के नियमों का भी हवाला वरिष्ठ वकील हरिशंकर जैन ने दिया। उन्होंने अदालत के सामने दलील रखी कि वक्फ के नियमों के मुताबिक जिस जगह पर मस्जिद बनाई गई है या जिसे मस्जिद कहा जा रहा है, वह पहले से हिंदू धर्म से संबंधित है। ऐसे में वहां पर मस्जिद बनाई ही नहीं जा सकती है।

उधर, दीन मोहम्मद के केस में 15 गवाहों ने कहा वहां पूजा होती रही। 1993 में ब्यास जी पूजा किया करते थे। जो बाद में बैरिकेडिंग कर सील कर दी गई। यह भी कहा कि अप्रत्यक्ष देवता भी हिन्दू लॉ में मान्य हैं। वक्फ प्रॉपर्टी के बाबत कहा कि मुस्लिम लॉ में स्पष्ट है कि जो प्रॉपर्टी वक्फ को दी जाती है वह मालिक द्वारा ही दी जा सकती है। इस बाबत कोई वक्फ के पास कोई डीड नहीं है और नहीं कोई सबूत कोर्ट में पेश किया गया है कि यह वक्फ की संपत्ति है। हरिशंकर जैन ने स्पष्ट किया कि 1937 में जो दीन मोहम्मद का फैसला हुआ वह सभी पर बाध्यकारी नहीं है क्योंकि उसमें हिंदू पक्षकार ही कोई नहीं था। काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट के सेक्शन दो के मुताबिक वह ऑर्डर और निर्णय शून्य है। इस एक्ट में आराजी संख्या 9130 की सारी प्रॉपर्टी देवता में निहित है।

मुस्लिम पक्ष का प्रवेश रोकने पर सुनवाई अब 21 को

ज्ञानवापी में मुस्लिम पक्ष के प्रवेश पर रोक और वहां मिले शिवलिंग के पूजा पाठ राग भोग की अनुमति दिए जाने की अर्जी में संशोधन पर बहस गुरुवार को पूरी हो गई। सिविल जज सीनियर डिवीजन फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट महेंद्र कुमार पांडेय की अदालत में बहस हुई। अब अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी। बता दें, ज्ञानवापी में मुस्लिम पक्ष के प्रवेश पर प्रतिबंध समेत तीन मांगों पर सिविल जज (फास्ट ट्रैक) कोर्ट में याचिका दाखिल थी। 77 पेज के प्रार्थना पत्र में तीन बिंदुओं पर संशोधन के लिए वादी अधिवक्ता ने पिछली सुनवाई में मांग की थी। प्रतिवादी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के अधिवक्ता ने संशोधन की मांग को खारिज करने के लिए दलीलें दीं। अब 21 जुलाई को अर्जी में संशोधन पर कोर्ट का आदेश आएगा। पिछली सुनवाई पर सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में अंजुमन इंतजामिया ने वादी की तरफ से दाखिल अंतरिम निषेधाज्ञा शपथपत्र और अन्य प्रपत्रों पर आपत्ति दाखिल करने के लिए उसकी प्रति उपलब्ध कराने को कहा था। उधर वादी पक्ष ने दाखिल वाद पत्र में टाइपिंग मिस्टेक के लिए संशोधन आवेदन दिया था, जिसकी प्रति विपक्षियों को आपत्ति के लिए उपलब्ध कराई गई थी। इस वाद में मुस्लिम पक्ष का ज्ञानवापी में प्रवेश रोकने, ज्ञानवापी हिंदुओं को सौंपने और जो शिवलिंग सर्वे के दौरान मिला है, उसके पूजा-पाठ राग भोग की नियमित अनुमति दिए जाने की मांग की गई है। यह याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के संस्थापक जितेंद्र सिंह बिसेन की पत्नी किरण सिंह की ओर से दाखिल है।

हाईकोर्ट में भी बहस पूरी, आज से मस्जिद पक्ष रखेगा दलीलें

आदि विश्वेश्वर नाथ मंदिर और ज्ञानवापी विवाद मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी चल रही है. मंदिर पक्ष की दलीलें पूरी हो गई हैं और अब इस मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी और इसमें मस्जिद कमेटी और वक्फ बोर्ड अपनी तरफ से दलील पेश करेगा. दरअसल पुरातत्व विभाग से सर्वे कराने के अधीनस्थ न्यायालय वाराणसी के आदेश पर हाईकोर्ट ने पहले ही 31 जुलाई तक रोक को बढ़ा दिया है. वाराणसी के अधीनस्थ न्यायालय का सर्वे कराने के आदेश को अंजुमन इनाजनिया मसाजिद कमेटी वाराणसी और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने चुनौती दी थी. इस मामले की सुनवाई जस्टिस प्रकाश पाडिया कर रहे हैं. जानकारी के मुताबिक इसमामले में मंदिर की ओर से पेश अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने दलील दी कि औरंगजेब के आदेश के बाद काशी विश्वेश्वर नाथ मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया था. जमीन का मालिकाना हक मंदिर के पास ही बना हुआ है और वक्फ का गठन होने के बावजूद कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है. उन्होंने कोर्ट में कहा कि औरंगजेब ने कभी भी भूमि का स्वामित्व नहीं लिया और मंदिर परिसर की चारदीवारी हजारों साल पुरानी है, जो मस्जिद की संरचना से भी पुरानी है. रस्तोगी ने तर्क देते हुए कहा कि आम मुसलमानों को मस्जिद में नमाज अदा करने का अधिकार नहीं है. इसको लेकर 1936 में दीन मोहम्मद और अन्य लोगों ने बनारस सिविल कोर्ट में एक दावा दायर किया. जिसमें उन्हें राहत नहीं मिली. जबकि 1942 में, उच्च न्यायालय ने केवल वादकारियों को जुमा की प्रार्थना करने की अनुमति दी है. उन्होंने कोर्ट में कहा कि वक्फ बोर्ड या अंजुमन इंजतिया मसाजिद उस दीवानी वाद में पक्षकार नहीं रहे हैं. अपने तथ्यों को पेश करते हुए विजय शंकर रस्तोगी ने बताया कि पूरा परिसर ज्ञानवापी मंदिर का है और अकबर ने इलाहाबाद किला बनाने के लिए जमीन भी खरीदी थी. औरंगजेब ने दक्षिण भारत में भी जमीन खरीदी और मस्जिद का निर्माण कराया. उन्होंने कहा कि राजा जमीन का मालिक नहीं है, वह टैक्स वसूलता है.

ज्ञानवापी प्रकरण

ज्ञानवापी को औरंगजेब ने 1669 में ध्वस्त कर दिया था। इस स्थान में मूल रूप से एक विश्वेश्वर मंदिर था, जिसे टोडर मल ने नारायण भट्ट के साथ स्थापित किया था. वो बनारस के सबसे प्रसिद्ध ब्राह्मण परिवार के मुखिया थे. सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में, जहांगीर के एक करीबी सहयोगी वीर सिंह देव बुंदेला एक संभावित संरक्षक थे. उन्होंने कुछ हद तक मंदिर का नवीनीकरण किया था. लगभग 1669 के आसपास, औरंगजेब ने मंदिर को गिराने का आदेश दिया और इसके स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण शुरू किया. मस्जिद का नाम एक निकटवर्ती कुएं, ज्ञान वापी से लिया गया है. किवदंतियों के अनुसार शिव ने इसे स्वयं शिवलिंग को ठंडा करने के लिए खोदा था। माधुरी देसाई ने मस्जिद के इतिहास के हाल के वृत्तांतों को बार-बार विनाश और मूल मंदिर के पुनर्निर्माण के इर्द-गिर्द केंद्रित करने के लिए नोट लिखा. फिर 5 महिलाओं ने याचिका दायर कर श्रृंगार गौरी की रोज पूजा का अधिकार मांगा है।

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