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आजमगढ़-रामपुर लोकसभा सीट पर कल होगा मतदान

वोटरों को खटक रहा अखिलेश-मायावती का चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखना

-संजय सक्सेना, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों के लिए कल 23 को मतदान होगा। 26 जून को नतीजे आ जायेगें। इन उप चुनावों में सबसे बड़ी बात जो देखने को मिली, वह यह थी कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमों मायावती ने चुनाव प्रचार से दूरी बनाकर रखी।दोनों ही नेता सोशल मीडिया पर ही एक्टिव रहे। ऐसे में सवाल यही है कि जिन नेताओं ने चुनाव के समय जनता से दूरी बनाए रखी,उनका चुनाव के बाद क्षेत्र की जनता से कैसा व्यवहार होगा।इस मुद्दे को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रचार के दौरान ‘हवा’ भी दी थी। इतना ही नहीं अखिलेश और मायावती के यह रवैया वोटरों को भी रास नहीं आ रहा है। खैर, कहने को तो यूपी की 80 में से मात्र दो लोकसभा सीटों आजमगढ़ और रामपुर में उप-चुनाव हो रहा है,लेकिन इन दोनों सीटों के नतीजों की गंूज दूर तक सुनाई देगी। इसी लिए इन दो लोकसभा सीटों के चुनाव ने प्रदेश में सियासी पारा गरमा दिया है। यूं तो दोनों ही सीटें समाजवादी पार्टी का गढ़ मानी जाती हैं, लेकिन बीजेपी और बहुजन समाज पार्टी यहां सेंधमारी में पूरी ताकत से लगी हैं। आजमगढ़ लोकसभा सीट, जहां से 2019 में सपा मुखिया अखिलेश यादव खुद चुनाव लड़कर संसद पहुंच चुके हैं। वह सीट अखिलेश के लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफे के बाद खाली हुई है।

वहीं दूसरी रामपुर लोकसभा सीट सपा का कद्दावर मुस्लिम चेहरा माने जाने वाले आजम खान की है, जिनका इस इलाके में दबदबा माना जाता है। वह रामपुर की राजनीति के चाणक्य माने जाते हैं, जिसके ऊपर हाथ रख देते हैं उसकी चुनाव में जीत सुनिश्चत हो जाती है। 2024 में होने वाले आम चुनाव से करीब दो साल पहले हो रहे उप-चुनाव में बीजेपी ने सपा के खिलाफ अपना पूरा जोर लगा दिया है।यह चुनाव उस समय होने जा रहा है जबकि पैगंबर साहब पर बीजेपी की एक पूर्व नेत्री के विवादित बयान देने के बाद मुसलमान वोटर भड़का हुआ है। नुपूर की गिरफ्तारी को लेकर कई जगह हिंसा हो चुकी है, लेकिन अभी नुपूर शर्मा की गिरफ्तारी नहीं हुई है। वहीं सेना में भर्ती के लिये लाई गई ‘अग्निवीर’ योजना को लेकर युवाओं का गुस्सा चरम पर है। इसको लेकर कई जगह युवा सड़क पर उतर कर उपद्रव कर रहे हैं। उक्त दो मुद्दों पर बीजेपी चुनाव में अपने आप को असहज महसूस कर रही है। ताजा राजनीतिक घटनाक्रम को देखें तो आजमगढ़ जिस बेल्ट में आता है, वहां से भारी संख्या में युवा सेना में जाते हैं। केंद्र सरकार की हालिया अग्निपथ योजना को लेकर देश भर में विरोध चल रहा है। ऐसे में आजमगढ़ का चुनाव बीजेपी की इस नई स्कीम को लेकर जनमत का टेस्ट भी कर देगा कि वोट देते समय लोग इस स्कीम को ध्यान में रखकर फैसला लेंगे या नहीं?

आजमगढ़ लोकसक्षा क्षेत्र की बात करें तो यहां से मुलायम परिवार के ही धर्मेंद्र यादव उम्मीदवार हैं। बीजेपी ने भोजपुरी सिने स्टार दिनेश लाल यादव पर पुनः दांव लगाया है। बीएसपी ने यहां स्थानीय नेता गुड्डू जमाली को उतारकर लड़ाई को एक बार फिर दिलचस्प बना दिया है। उलेमा कौंसिल ने भी जमाली को स्थानीय नेता बताकर उनका समर्थन करने का निर्णय लिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव को यहां से 60 फीसदी वोट मिले थे लेकिन इस बार हालात अलग हैं। पहले तो पिछली बार उम्मीदवार अखिलेश यादव थे लेकिन इस बार लोकप्रियता के पैमाने पर दिनेश लाल यादव धर्मेंद्र यादव से कहीं आगे हैं।इसके साथ ही विधान सभा चुनाव के बाद कई मुस्लिम संगठन भी समाजवादी पार्टी पर मुसलमानों का साथ नहीं देने का आरोप लगा चुके हैं।ऐसे में बसपा नेता गुड्डू जमाली सपा के लिए मुसीबत का सबब बन सकते हैं।वैसे भी मायावती विधान सभा चुनाव के बाद लगातार मुसलमानों को आगाह कर रही हैं कि वह अखिलेश यादव के बहकावे में नहीं आएं। सपा मुसलमानों को छल रही है।वैसे भी गुड्डू जमाली इलाके में लोकप्रिय नेता हैं। इसके अलावा बीजेपी के उम्मीदवार दिनेश लाल यादव यादव सपा के यादव वोटों को अपनी ओर खींच सकते हैं। सपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल है तो बीजेपी के लिए भी यह रण उसकी सियासी धमक के जीतना जरूरी है।

आजमगढ़ में बीजेपी नेता, समाजवादी पार्टी के खिलाफ परिवारवाद को मुद्दा बनाए हुए हैं तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार के दौरान सपा नेता और यहां के निर्वतमान सांसद अखिलेश पर आजमगढ़ की जनता के साथ धोखा किए जाने का आरोप लगाते रहे। बीजेपी लगातार यह दावा करती है कि उत्तर प्रदेश में उसने परिवारवाद को खत्म कर दिया है। ऐसे में आजमगढ़ चुनाव जीतकर वह अपने इस दावे को और पुख्ता करने की कोशिश करना चाहती है। यही वजह है कि मुस्लिम-यादव बहुल इलाके में अपनी जीत तय करने के लिए पार्टी ने अपने सभी दिग्गजों को चुनाव प्रचार के मैदान में उतारा। डिप्टी सीमए केशव मौर्य से लेकर योगी आदित्यनाथ ने तो वहां रैली की ही इसके साथ ही पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही को क्षेत्र में चुनाव की कमान संभाले हुए हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पार्टी आजमगढ़ चुनाव को लेकर बीजेपी कितनी गंभीर है।

आजमगढ़ के बाद रामपुर लोकसभा सीट की बात की जाए तो यहां से आजम खान सांसद थे और उन्होंने रामपुर से ही विधानसभा सीट जीतने के बाद लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उस समय वह जेल में थे। वहीं से चुनाव जीत गए थे, अब यह सीट खाली हुई तो आजम खान बाहर आ गए हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जो शख्स आजम खान जेल में रहकर अपना चुनाव बेहद आसानी से जीत सकता है, वह अपने क्षेत्र में खुला घूमते समय कितना ‘खतरनाक’ साबित हो सकता है। इसीलिए बीजेपी ने इस पर पूरी तरह से अपनी नजर गड़ा रखी है। सपा का गढ़ और मुस्लिम बहुल होने के बावजूद रामपुर में बीजेपी अपनी पूरी शक्ति के साथ चुनाव लड़ रही है। बीजेपी के उम्मीदवार घनश्याम लोधी हैं, जो पहले सपा में रह चुके हैं। वह आजम खान के करीबी भी माने जाते रहे हैं।

रामपुर में आजम खान की बीजेपी सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ से अदावत के चर्चे सियासी गलियारों से लेकर चौक-चौराहे तक में खूब सुनने को मिल जाती हैं। सरकार बनने के बाद से ही योगी ने आजम खान पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया था। आजम को जेल भी जाना पड़ा था। ऐसे में रामपुर की जंग इस अदावत में शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा भी बन सकती है। हालांकि, बीजेपी के लिए यह आसान नहीं होगा। सपा ने यहां से आजम के करीबी आसिम रजा को टिकट दिया है।आजम खान उप-चुनाव को लेकर काफी सक्रिय भी हैं और लगातार मंचों पर भाषणों के दौरान अपने रंग में लौटते नजर आ रहे हैं।बीजेपी और योगी सरकार पर लगातार हमलावर रहते हैं। रामपुर में बीजेपी अगर जीतती है तो इस जीत के बाद वह जोरशोर से यह प्रचारित करने की कोशिश करेगी कि सरकार बनने के बाद आजम खान पर लिए गए ऐक्शन का ‘सियासी शत्रुताश् से कोई संबंध नहीं था। साल 2022 के चुनाव के मद्देनजर मुस्लिम वोटों के भगवा पार्टी के साथ होने के दावे का परीक्षण भी इस चुनाव में हो जाना है।

बहरहाल, 23 जून को मतदान और 26 को मतगणना होगी। उसी दिन संभवत: नतीजे भी आ जाएंगे। आजमगढ़ में सिर्फ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रचार करने गए थे, सपा की तरफ से अखिलेश यादव और बसपा की तरफ से मायावती यहां प्रचार के लिए नहीं पहुंची। यही स्थिति रामपुर लोकसभा सीट पर भी रही। सदन के वरिष्ठतम सदस्य और रामपुर शहर से दसवीं बार विधायक चुने गए मोहम्मद आजम खां के किले में सेंधमारी के लिए भाजपा ने ‘यूपी सरकार’ ही रामपुर में उतार दी थी। सरकार के कई मंत्री यहां डेरा डाले रहे, वहीं डिप्टी सीएम से लेकर मुख्यमंत्री तक ने यहाँ जनसभाएं की। उधर,आजम ने भी अपने करीबी को जिताने और अपनी परंपरागत सीट को काबिज रखने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ीे हैं। रोजाना सभाएं करके आसिम को राजा बनाने की अपील करते रहे. आजम यहां अपने दम पर राजा को चुनाव लड़ा रहे हैं, यहां सपा प्रत्याशी को मिली हार या जीत का सेहरा अखिलेश यादव के सिर पर कतई नहीं बंधेगा. जो भी श्रेय जाएगा वह आजम खान के खाते में ही जाएगा।

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