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worrying : ग्लोबल इकोनॉमी पर भारी पड़ता रूस-यूक्रेन युद्ध

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार ग्लोबल इकोनॉमी पर रूस-यूक्रेन युद्ध का असर तेजी से दिखाई देने लगा है। एक ओर दुनिया के अनेक देशों के सामने खाद्यान्न का संकट मुंह बाएं खड़ा है तो दूसरी और आर्थिक गतिविधियां बुरी तरह से प्रभावित हो रही हैं। कोविड त्रासदी के बावजूद 2021 में जिस तरह से दुनिया के देशों ने आर्थिक मंदी को पटरी पर लाने के प्रयास किए थे, लगता है 2022 के शुरुआती पांच महीनों में ही वह सब धुल गया है। वैश्विक आंकड़ों के अनुसार भारत, अमेरिका, रूस, चाइना, जापान, इंग्लैंड, फ्रांस, डेनमार्क सहित अधिकांश देशों में इन पांच माह में आर्थिक सुधारों में उल्लेखनीय कमी देखी जा रही है। रूस में सबसे अधिक -12.7 प्रतिशत रिकवरी रेट कम रही है तो भारत और अमेरिका में -1.2 प्रतिशत, डेनमार्क में 2.2, जापान में 1.7, फ्रांस में 1.8, इंग्लैण्ड में 1.1, इंडोनेशिया में 0.5 तो चाइना में 0.7 फीसदी निगेटिव रही है। दरअसल रूस तो सीधे युद्ध से जुड़ा हुआ है, ऐसे में वहां की निगेटिव दर तो साफ है पर अन्य देशों की निगेटिव दर ग्लोबल इकोनॉमी के लिए गंभीर है।

दरअसल जब रूस-यूक्रेन में युद्धारंभ हुआ था तब दुनिया ने ही नहीं अपितु रूस ने भी नहीं सोचा था कि यह युद्ध इतना लंबा खिंच जाएगा। रूस ने जिस अति आत्मविश्वास के चलते यूक्रेन से युद्ध की शुरुआत की थी तब उसका जो आकलन था वह पूरी तरह से भरभरा कर उलट गया है। लाख प्रयासों के बाद भी रूस यूक्रेन को सरेंडर नहीं करा सका है और उसका खामियाजा रूस और यूक्रेन के नागरिक तो भुगत ही रहे हैं बल्कि आज सारी दुनिया इससे प्रभावित हो रही है। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं का निर्यातक देश यूक्रेन आज गेहूं भेजने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में गेहूं को लेकर दुनिया के देश संकट में घिर गए हैं। गेहूं ही क्यों इस युद्ध के कारण खनिज तेल का संकट आ गया है। खाद्य तेल का संकट सबके सामने हैं। दरअसल कहने को यह युद्ध रूस यूक्रेन के बीच हो रहा हो पर इसका प्रभाव ग्लोबल पड़ रहा है। हालांकि यूक्रेन को दुनिया के देशों का जबरदस्त समर्थन मिल रहा है पर यह समस्या का समाधान नहीं है। यूक्रेन में अब तक दुनिया के देशों के 50 से अधिक बड़े नेता जाकर मोरल सपोर्ट दे चुके हैं। वार जोन में फ्रांस के राष्ट्र्पति, जर्मनी के चांसलर और इटली के प्रधानमंत्री गए हैं पर समस्या का समाधान कहीं दिखाई नहीं दे रहा।

साल 2019 से चले कोरोना संकट ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। कोरोना के एक के बाद एक आते वेरियंट्स ने बुरी तरह से प्रभावित किया है। लंबे लॉकडाउन के दौर से दुनिया एक तरह से ठहर ही गई। एक समय तो लोग घर में ही बंद होकर रह गए तो आर्थिक गतिविधियों का प्रभावित होना स्वाभाविक है। इतना सबकुछ होने और कोरोना का भय आज भी व्याप्त होने के बावजूद 2021 में दुनिया के देशों ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयास किए और प्रयासों के सार्थक परिणाम भी सामने आए। पर रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को दूसरी तरह से प्रभावित कर दिया है। मजे की बात यह है कि भारत ने अवश्य तटस्थ रहकर कुछ प्रयास किए हैं, बाकी दुनिया के दिग्गज देशों ने युद्ध के इस संकट को खत्म करने के जिस तरह के प्रयास किए जाने चाहिए थे, वैसे नहीं किए और उसका परिणाम यह रहा कि एक और युद्ध के कारण निरपराध नागरिक शिकार हो रहे हैं तो दूसरी और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सभी देशों पर प्रभाव पड़ रहा है। खाद्यान्नों और तेल के दाम आसमान छूने लगे हैं। कई देशों की अर्थव्यवस्था तो बुरी तरह से प्रभावित हुई है। दोनों देशों के बीच युद्ध समाप्ति के कोई आसार भी नहीं दिखाई दे रहे हैं। कहा जाता था कि भविष्य में होने वाले युद्ध दो-चार दिन के युद्ध होंगे पर इसके उलट हालात सामने हैं। अहम की इस लड़ाई में कोई एक देश नहीं अपितु सारी दुनिया प्रभावित हो रही है। दुनिया के विकास की रफ्तार को निगेटिव दिशा में ले जाया जा रहा है। सही मायने में अब हमें अत्याधुनिक कहलाने का हक भी नहीं रह गया है, क्योंकि जिस तरह से विनाश का रास्ता अपनाया जा रहा है उसके परिणाम अच्छे हो ही नहीं सकते।

सर्व शक्ति संपन्न समझ रहे इंसानों को कोरोना ने हैसियत बता दी है। घर की चारदीवारी में बंद करके यह बता दिया कि आखिर हो क्या? उसके बावजूद हमारी अकड़ बरकरार है। हांलाकि कोविड वैश्विक महामारी है और उसके आगे इंसान भी बेबस था पर रूस-यूक्रेन का युद्ध तो मानवजनित मानव की महत्वाकांक्षाओं का युद्ध है, जिसे होने न होने देना दोनों देशों के हाथ में होने के बावजूद कुछ भी नहीं किया जा पा रहा है। इस युद्ध को समाप्त कराना ही आज की आवश्यकता व मानवता के लिए जरूरी है। अब एक-दूसरे को उकसाने के स्थान पर किसी भी तरह से इस युद्ध को समाप्त कराना ही लक्ष्य होना चाहिए। अन्यथा जो हालात बन रहे हैं वह दुनिया के लिए अच्छे हालात नहीं कहे जा सकते।

(लेखक  स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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