आक्रांताओं के तलवार का जवाब न्यायालय की कलम से मिलने की आस

ज्ञानवापी के भीतर तालाब है और उसी में औरंगजेब ने शिवलिंग फेकवा दिया था, इसका जिक्र कई इतिहासकारों ने किया है। कुछ ऐसे ही दलीलें शुक्रवार को हिन्दू पक्षकारों के सीनियर अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने वाराणसी के जिला न्यायालय में जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत में हिन्दू पक्ष की दलीलें पूरी करने के बाद कहीं। उन्होंने न्यायालय से उम्मींद जताते हुए कहा, औरंगजेब ने जो तलवार से हासिल किया था उसे कोर्ट अपनी कलम से सही करे, ताकि यह सिद्ध हो सके कि तलवार से ज्यादा शक्ति कलम की होती है। हालांकि न्यायालय में सुनवाई अभी जारी है। इस मामले अब 18 जुलाई को भी सुनवाई जारी रहेगी। उम्मींद है कि सबकुछ ऐसे चलता रहा और बहस होती रही तो जुलाई माह के अंत तक तय हो जायेगा ज्ञानवापी प्रकरण में एक्ट 1991 लागू हो गया नहीं। बता दें, अभी ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी और अन्य ग्रहों के नियमित दर्शन पूजन मामले की पोषणीयता पर सुनवाई हो रही है। फैसला अगर हिन्दू पक्ष के मुताबिक आयेगा, तभी साबित हो पायेगा कि सर्वे में मिली शिवलिंग आदि विश्वेसर ही है।

-सुरेश गांधी

फिरहाल, ज्ञानवापी श्रृंगार गौरी और अन्य ग्रहों के नियमित दर्शन पूजन मामले की सुनवाई लगातार चौथे दिन शुक्रवार को वाराणसी के जिला जज की अदालत में हुई। यह सुनवाई मामले की पोषणीयता पर की जा रही है। हिंदू पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन व विष्णु शंकर जैन ने एक-दो नहीं कई ऐसी दलीलें व साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत किए है, जिससे यह साबित हेाता है कि ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग ही आदि विश्वेसर है। तर्क में कहा गया है कि 1960 में बना यूपी सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड पर काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट 1983 प्रभावी है क्योंकि यह राष्ट्रपति से अनुमोदित है। इसलिए ज्ञानवापी को वक्फ संपत्ति कहना या घोषित करना जालसाजी और बहुत बड़ा फ्रॉड है। विष्णु शंकर जैन का आरोप है इस मामले में यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कोर्ट और जनता को गुमराह किया। वक्फ बोर्ड में दर्ज 100 नंबर रजिस्ट्रेशन के बाबत कोई भी सबूत नहीं है। ऐसे में कहा जा सकता है कि वक्फ बोर्ड देश की सरकारी संपत्तियों को इसी तरह कई जगहों पर कब्जा कर रहा है और हिंदू सो रहे हैं। हरिशंकर जैन ने बहस के दौरान दलील में वक्फ असेट्स मैनेजमेंट सिस्टम ऑफ इंडिया की बेबसाइट पर उपलब्ध विवरण का हवाला देते हुए कहा कि ज्ञानवापी प्रॉपर्टी के वक्फ का नोटिफिकेशन, वक्फ रजिस्ट्रेशन तिथि, वक्फ निर्माण की तिथि, प्रॉपर्टी का खाता, खसरा, पट्टा, प्लॉट नंबर निल दिखाया गया है। प्रॉपर्टी शहर में होने के बावजूद मंडुआडीह ग्रामीण एरिया में दर्ज बताया गया है। जिस स्थान को विशेष उपासना स्थल कानून 1991 बनने से पहले हिंदुओं का पूजा स्थल घोषित कर दिया गया उस स्थान पर यह कानून नहीं लागू होता है। धार्मिक स्वरूप के मुद्दे पर कहा कि वेद, शास्त्र, उपनिषद, स्मृति, पुराण से साबित है कि पूरी प्रॉपर्टी मंदिर की है। जबरदस्ती घुस आने से व नमाज पढ़ लेने से वो मस्जिद की संपत्ति नहीं हो जाती। यहां हमारे अधिकार का अतिक्रमण किया गया। 1993 से पहले ब्यास जी के तहखाने में और जगह जगह पर पूजा की जाती रही। लेकिन उसे बैरिकेडिंग कर जबरन रोक दिया गया।

विश्वनाथ मंदिर एक्ट के सेक्सन 5 के तहत यह प्रॉपर्टी देवता में निहित हो गई तब विशेष धर्म उपासना स्थल कानून लागू नहीं हो सकता। दलील में कहा कि ऑर्डर 7 रूल 11 के आवेदन में जो बात कही गई है उसी पर कोर्ट विचार करेगी। इसके इतर विपक्षी जो भी बात कहेंगे उस पर विचार का कोई औचित्य नहीं है। जिन स्थलों पर पूजा करने का अधिकार विशेष धर्म उपासना स्थल एक्ट 1991 आने से पहले पूजा का अधिकार प्राप्त था उन स्थलों पर यह एक्ट प्रभावी नहीं है। बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि देवता की संपत्ति पर वक्फ हो ही नहीं सकता। हम चाहते है कि औरंगजेब ने जो तलवार से हासिल किया था उसे कोर्ट अपनी कलम से सही करे ताकि यह सिद्ध हो सके कि तलवार से ज्यादा शक्ति कलम की होती है। यह भी कहा कि 1960 में बना यूपी सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड पर काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट 1983 प्रभावी है क्योंकि यह राष्ट्रपति से अनुमोदित है। अगर मस्जिद वक्फ है तो उसके दस्तावेज लाएं, लेकिन चुनौती के बावजूद भी मस्जिद पक्ष अब तक दस्तावेज पेश नहीं कर पाया है। सोहन लाल ने बताया कि कोई भी संपत्ति तीन कारणों से ही वक्फ हो सकती है. पहला- खरीदी गई हो. दूसरा, दान दी गई हो और तीसरा, नींव से बनाई गई हो, लेकिन कथित ज्ञानवापी मस्जिद में ये तीनो शर्तों का पालन नहीं हुआ तो मंदिर ये मस्जिद कैसे हुई. मंदिर पक्ष के अधिवक्ता सुभाषनंदन चतुर्वेदी ने कहा कि हमने एक्ट का भी हवाला दिया, जिसमे वक्फ संपत्ति के नियमों और शर्तों का उल्लेख है. विष्णु शंकर जैन ने कहा कि इस मामले में तमाम साक्ष्यों और पुराने फैसले को कोर्ट में रखा गया है और हमारी दलील मुस्लिम पक्ष के दावों को झूठा साबित करती है. जब मुस्लिम पक्ष 600 साल से वहां नमाज अदा होने की बात करता है तो हमने कोर्ट में हजारों सालो से आदि विश्वेश्वर के होने के प्रमाण दिए हैं.

इसके अलावा अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन ने मुकदमा संख्या 62/1933 का भी हवाला देते हुए कहा कि दीन मोहम्मद और उसके भाइयों की याचिका भी इसलिए खारिज हुई. उर्दू भाषा के कथित औरगंजेब के मंदिर तोड़ने के आदेश को भी मंदिर पक्ष ने अदालत में रखा. साथ ही ऐश्वर्य, मुक्ति, यज्ञ, गणेश, श्रंगार गौरी आदि आठों मंडप का भी शास्त्र संमत उल्लेख अदालत के सामने रखा गया. शिवपुराण का जिक्र करते हुए मंदिर पक्ष के अधिवक्ता विष्णुशंकर जैन ने बताया कि हिंदू मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कैसे होती है और अगर कोई इसे नष्ट कर भी देता है तो मंदिर का संकल्प कभी नष्ट नहीं होता. सुभाष नंदन चतुर्वेदी ने कहा कि वक्फ का कोई दस्तावेज मस्जिद पक्ष ने नहीं रखा है. उन्हें स्वामित्व कैसे मिला, ये भी मस्जिद पक्ष नहीं बता पाया. किसी को नोटिस नहीं, कोई आदेश नहीं तो फिर कैसे ये वक्फ बोर्ड की संपत्ति हो गई. ऐसे तो पूरे देश को आप वक्फ संपत्ति बना दीजिए. मंदिर का स्वरूप बदलने से उसकी आस्था कभी खत्म नहीं होती. केवल ढांचा बदलने और नमाज पढ़ने से हमारी आस्था खत्म नहीं होती. या यूं कहे अगर किसी आक्रांता ने मंदिर नष्ट भी कर दिया है तो इससे उसकी दिव्यता खत्म नही हो जाती है. यह अलग बात है कि मस्जिद पक्ष ने कहा कि वहां नमाज होती थी, होती है और आगे भी होती रहेगी. सुनवाई के दौरान विष्णुशंकर जैन ने आर्टिकल 25 की मस्जिद पक्ष की आपत्ति पर 1995 का हवाला देते हुए अगर कहीं नियमों का उल्लघंन होता है तो आप सीधे सिविल कोर्ट आ सकते हैं. वीके मुखर्जी और रामजानकी डेटीज के केस का भी हवाला दिया. इस्माइल फारुखी के केस का भी मंदिर पक्ष ने हवाला दिया. यही नहीं काशी विश्वनाथ एक्ट का महत्व क्या है और स्वयंभू देवता किसे कहते हैं, इस पर भी मंदिर पक्ष ने विस्तार से अपनी बात रखी. उधर, ज्ञानवापी विवाद में अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है. याचिका में सर्वे के दौरान मिली गोलाकार आकृति की पूजा की मांग की गई है. ये याचिका श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद से जुड़े राजेशमणि त्रिपाठी ने दाखिल की है. उन्होंने कोर्ट से गुहार करते हुए कहा कि सावन के महीने में हिंदुओं को पूजा करने की विशेष इजाजत दी जाए.

दस प्रमुख दलीलें, जो चर्चा में रही

देखा जाएं तो ज्ञानवावी श्रृंगार गौरी मामले में मुस्लिम पक्ष की दलीलों के बाद हिंदू पक्ष की ओर से न्यायालय में मंदिर होने की दलीलें प्रमुखता से रखी गयी। जिसमें दस दलीलें प्रमुख् रही-

1- जहां पर प्राण प्रतिष्ठा होती है वह स्थल का स्वामित्व अनंत काल तक नहीं बदलता। इस लिहाज से यह जमीन मस्जिद या वक्फ की नहीं है।
2- भूखंड का आराजी संख्या 9130 (विवादित परिसर) पर लगातार दर्शन पूजन होता रहा है। 1993 में बैरिकेडिंग होने के तक हिंंदू देवी देवताओं की पूजा होती थी।
3- स्वयंभू को स्पष्ट किया कि उनकी प्राण प्रतिष्ठा नहीं होती वह ज्योतिर्लिंग होते हैं। काशी विश्वनाथ एक्ट 1993 में पूरे परिसर को बाबा विश्वनाथ के स्वामित्व का हिस्सा माना गया। एक्ट के खिलाफ जो फैसले हुए हैं वह शून्य हैं।
4- 1983 में हिंदू लॉ में भगवान के प्रकार और अधिकार को लेकर स्पष्ट व्याख्या को अदालत में पेश करते हुए समर्थन में पुराने फैसलों की नजीर पेश की है।
5- राम जानकी प्रकरण 1999 के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के नजीर को भी सामने रखा गया। वहीं इसके अतिरिक्त अयोध्या प्रकरण को लेकर भी हिंदू पक्ष ने अदालत में दलील रखी है।
6- पूजा के लिए मूर्ति की जरूरत नहीं, हिंदू धर्म में समर्पण और निराकार मान्यता के अनुसार पूजन की मान्यता को झुठलाया नहीं जा सकता।
7- हमारे भगवान को जीवित माना जाता है। इसलिए उनकी आरती और भोग की मान्यता है। साथ ही सरकार इस पर कर भी लगाती है।
8- वक्फ संपत्ति नहीं हो सकती क्योंकि वक्फ की संपत्ति का कोई मालिक होना चाहिए लेकिन इस मामले में संपत्ति हस्तांतरण का कोई आधार नहीं है।
9- पूर्व में दीन मोहम्मद केस (1937) में भी 15 गवाहों ने स्पष्ट किया था कि यहां पर पूजा अर्चना होती है। ऐसे में यहां पर मंदिर की मान्यता कोई नई बात नहीं है।
10- मंदिर तोड़ने के बाद किन हिस्सों में पूजा होती थी उसका दस्तावेज भी उपलब्ध है। लिहाजा मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने के बाद भी विध्वंश के बाद अशेष हिस्सों में हिंदू मतावलंबी पूजन करते रहे हैं।

1194 से 1669 के बीच ज्ञानवापी ने झेले हैं कई झंझावात

एस आल्तेकर समेत कई इतिहासकारों का मानना है कि दो सितंबर, 1669 के दिन औरंगजेब ने विश्वेश्वर मंदिर का ध्वंस कर दिया। इसी की जगह मस्जिद बनाई गई। मंदिर में रखे शिवलिंग को इसी मस्जिद परिसर में छिपाने के लिए फेंक दिया गया। वाराणसी कोर्ट ने जब मां श्रृंगार गौरी की पूजा के लिए मिली अर्जी के बाद सर्वे के आदेश दिए तो ये सच्चाई सामने आ गई। सर्वे के तीसरे दिन तालाब से पानी पंप किया गया। तभी मुस्लिम पक्षकारों ने इसका विरोध किया। दलील थी कि मछलियां मर जाएंगी। ये बेतुका तर्क था। जब पानी हटाया गया तब कुएं जैसी रचना के बीच शिवलिंग का आकार दिखा। हिंदू पक्ष के मुताबिक इसका व्यास चार मीटर है और ऊंचाई तीन मीटर। भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के अंतर्गत अल्तेकर की पुस्तक में उल्लेखित तथ्य व चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा विश्वनाथ मंदिर के लिंग की सौ फीट उंचाई और उस पर निरंतर गिरती गंगा की धारा के संबंध में उल्लेख है। पौराणिक स्थली ज्ञानवापी का सच इतिहास के पन्नों में दर्ज है जो गवाही देते हैं कि किस तरह इस तीर्थ स्थली ने 1194 से 1669 के बीच कई झंझावात झेले। इसका उल्लेख काशी हिंदू विश्वविद्यालय व पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे ख्यात इतिहासकार डा. अनंत सदाशिव अल्तेकर की वर्ष 1936 में प्रकाशित पुस्तक हिस्ट्री आफ बनारस में प्रमुखता से है। इसे ज्ञानवापी मामले में संदर्भ के तौर पर पेश किया जा चुका है। इसमें मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा हिंदुओं के धार्मिक स्थलों को तहस-नहस करने का विवरण भी दर्ज है। पुस्तक के अध्याय चार में वर्णन है कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर की वजह से बनारस दो हजार साल पहले से ख्याति प्राप्त है।

पौराणिक साक्ष्यों की प्रमाणिकता

पौराणिक साक्ष्य बताते हैं कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर ज्ञानकूप के उत्तर तरफ स्थित है। इस मंदिर को 1194 से 1669 के बीच कई बार तोड़ा गया। ज्ञानवापी के झंझावात नारायण भट्ट लिखित पुस्तक त्रिस्थली सेतु में भी वर्णित हैं। इसमें वर्णन है कि यदि कोई मंदिर तोड़ दिया गया हो और वहां से शिवलिंग हटा दिया गया हो या नष्ट कर दिया गया हो तब भी स्थान महात्म्य की दृष्टि से वह स्थान विशेष पूजनीय है। इसकी परिक्रमा करके पूजा-अभिषेक संपन्न किया जा सकता है। 15वीं शताब्दी में अकबर के कार्यकाल में पुनरुद्धारः 15वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के कार्यकाल में राजा मान सिंह और राजा टोडरमल द्वारा मंदिर का पुनरुद्धार कराया गया था। डा. अल्तेकर की पुस्तक में कहा गया है कि अकबर के शासन काल में बनारस की स्थिति बदली और 1567 में शांति व्यवस्था कायम हुई। सात मार्च 2020 को इससे जुड़े दस्तावेज और 23 छाया चित्र कोर्ट में पेश किए गए थे। परमात्मा शरण की गवाही से खारिज हो गई थी दावेदारीः कागजातों के अनुसार 1936 में चले मुकदमे में प्रो. एएस अल्तेकर समेत कई लोगों के बयान हुए। इसमें यूनिवर्सिटी आफ लंदन के बनारसी मूल के इतिहासकार प्रो. परमात्मा शरण ने 14 मई 1937 को अतिरिक्त सिविल ब्रिटिश सरकार की ओर से बतौर साक्षी बयान दिया। उन्होंने औरंगजेब के दरबार के इतिहास लेखक मुश्तैद खां द्वारा लिखित ‘मा आसिरे आलम गिरि’ पेश करते हुए बताया था कि यह 16वीं शताब्दी के अंतिम चरण में एक मंदिर था। 1936 में पूरे ज्ञानवापी परिसर में नमाज पढ़ने के अधिकार को लेकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जिला न्यायालय में दायर किया गया था मुकदमा 7 गवाह दावेदारों की ओर से और 15 गवाह ब्रिटिश सरकार की ओर से पेश किए गए थे।

15 अगस्त 1937 को मस्जिद के अलावा अन्य ज्ञानवापी परिसर में नमाज पढ़ने के अधिकार को नामंजूर कर दिया गया था। 10 अप्रैल 1942 को सब जज के फैसले को सही ठहराते हुए अपील निरस्त कर दी थी हाई कोर्ट ने (इसका उल्लेख एआइआर (29) 1942 एएलएएबीएडी 353 में है) 15 अक्टूबर 1991 को वाराणसी की अदालत में ज्ञानवापी में नव मंदिर निर्माण और हिंदुओं को पूजन-अर्चन का अधिकार को लेकर पं. सोमनाथ व्यास, डा. रामरंग शर्मा व अन्य ने वाद दायर किया था। 1998 में हाईकोर्ट में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद व यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड लखनऊ की ओर से दो याचिकाएं दायर की गई थी इस आदेश के खिलाफ, 7 मार्च 2000 को पं.सोमनाथ व्यास की मृत्यु हो गई। 11 अक्टूबर 2018 को पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल) विजय शंकर रस्तोगी को वाद मित्र नियुक्त किया मामले की पैरवी के लिए। 8 अप्रैल 2021 को वाद मित्र की अपील मंजूर कर पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने का आदेश जारी कर दिया। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 57 (13) के तहत सामान्य इतिहास की पुस्तकों में भी वर्णित ऐतिहासिक तथ्य को साक्ष्य के तौर पर मान्यता है।

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