देश में 97 जगहों पर आचमन के लायक भी नहीं है गंगाजल, उत्तराखंड से बांगल तक बुरा हाल

नई दिल्ली : नमामि गंगे परियोजना की जब शुरुआत हुई तो दावा किया गया कि 2019 तक गंगा को स्वच्छ कर दिया जाएगा। इसके बावजूद राष्ट्रीय नदी में अब भी 60 सीवेज गिराया जा रहा है। आस्था का प्रतीक गंगा का पानी 97 स्थानों पर आचमन के लायक भी नहीं है।

उत्तराखंड, यूपी, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में 10139.3 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) सीवेज निकलता है। 3959.16 एमएलडी यानी करीब 40 फीसदी सीवेज ही ट्रीटमेंट प्लांट से होकर गुजरता है, बाकी 60 को सीधा गंगा में गिराया जाता है, क्योंकि गंगा के प्रमुख पांच राज्यों में मौजूद 226 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) भी अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश: 5500 एमएलडी सीवेज निकासी होती है। कुल 118 एसटीपी हैं, जिनकी क्षमता 3655.28 एमएलडी है। यहां एसटीपी की कुल क्षमता का 83 फीसदी ही सीवेज का उपचार हो रहा है।

झारखंड: 452 एमएलडी सीवेज की निकासी होती है, जबकि राज्य में 107.05 एमएलडी क्षमता वाले 16 एसटीपी काम कर रहे हैं। ये अपनी क्षमता का 68 फीसदी का ही उपचार कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल: 2758 एमएलडी सीवेज की निकासी हर रोज होती है, जबकि 1236.981 एमएलडी सीधे गंगा में गिराया जा रहा है। राज्य में कुल 37 एसटीपी हैं, जिनकी क्षमता 1438 एमएलडी सीवेज की है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) सिर्फ 136 एसटीपी की निगरानी करता है। इसमें से 105 ही काम कर रहे हैं, जिनमें से 96 एसटीपी नियम और मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह से नारोरा के बाद 97 स्थानों पर पानी की गुणवत्ता बहुत खराब है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बीते शुक्रवार को कहा कि यह चिंताजनक है कि गंगा में प्रदूषण का ग्राफ गिरने की बजाय बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की रिपोर्ट के मुताबिक, गंगा के प्रमुख पांच राज्यों में कुल 245 एसटीपी में से 226 एसटीपी ही ठीक हैं।