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आजाद भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू

द्रौपदी मुर्मू देश की पहली राष्ट्रपति हैं, जो 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद जन्मी हैं। हालांकि नरेन्द्र मोदी भी आजादी के बाद जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री है। देखा जाए तो अब तक भारत में जितने भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बने हैं, वो सब देश को आजादी मिलने से पहले वाले रहे है। बता दें कि द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून, 1958 को हुआ है। जबकि नरेन्द्र मोदी का जन्म 17 सितम्बर 1950 है। मतलब साफ है प्रचंड मतों से चुनी गयी द्रौपदी मुर्मू देश की पहली आदिवासी महिला है, जो देश के सर्वोच्च पद पर पहुंची है। उनका राष्ट्रपति बनना आजाद भारत के इतिहास में अपने आप में एक बड़ा ऐतिहासिक है, जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उस सपने को साकार करता दिख रहा है, जिसमें उन्होंने आजादी की असल मकसद तब पूरा होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान होगी, देखा था

-सुरेश गांधी

फिरहाल, द्रौपदी मुर्मू देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बन चुकी है। द्रौपदी मुर्मू के पैतृक शहर ओडिशा के रायरंगपुर से दिल्ली सहित पूरे देश में जश्न का माहौल है। उन्होंने विपक्ष के राष्ट्रपति उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को भारी मतों के अंतराल से हराया है। खास यह है कि उन्हें विपक्षी दलों के नेताओं ने भी खुल कर समर्थन मिला। मतदान में विपक्षी दलों में से झामुमो, अकाली दल, सुभासपा, शिवसेना, टीडीपी, वाईएसआर कांग्रेस और बीजू जनता दल समेत कई गैर एनडीए दलों ने द्रौपदी मुर्मू का समर्थन किया। परिणाम यह रहा कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाली द्रौपदी मुर्मू पहली आदिवासी महिला बन गयी। इससे पहले केआर नारायणन और रामनाथ कोविंद के रूप में देश को दो दलित राष्ट्रपति मिले हैं। कुल तीनों राउंड की बात करें तो कुल वोट 3219 थे. इनकी वैल्यू 8,38,839 थी. इसमें से द्रौपदी मुर्मू को 2161 वोट (वैल्यू 5,77,777) मिले. वहीं यशवंत सिन्हा को 1058 वोट (वैल्यू 2,61,062) मिले. खास यह है कि वह पहली राष्ट्रपति हैं जो पार्षद, विधायक, राज्यपाल बनने के बाद इस मुकाम तक पहुंची है। द्रौपदी मुर्मू 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत का पार्षद बनी। 2000 में विधायक बनीं। 2015 में राज्यपाल बनीं और अब राष्ट्रपति। सबसे चौकाने वाली बात यह है कि द्रौपदी मुर्मू सबसे कम आयु की राष्ट्रपति बनी हैं। इससे पहले देश में सबसे कम आयु में राष्ट्रपति बनने का रिकॉर्ड नीलम संजीव रेड्डी के नाम पर है। जब नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति बने थे उस वक्त उनकी आयु 64 वर्ष, 2 महीने और 6 दिन थी। जबकि द्रौपदी मुर्मू पद ग्रहण करते वक्त 64 साल, 1 महीना और 8 दिन होगी।

बता दें कि द्रौपदी मुर्मू को प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी लंबा अनुभव है. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर का आगाज जमीनी स्तर से शुरू किया और आज वो देश के प्रथम नागरिक के पद पर विराजमान हो गयी है। सामान्य परिवार से आने वाली मुर्मू का सार्वजनिक सेवा में लंबा अनुभव रहा है. मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव में एक आदिवासी परिवार में जन्म लेने के बाद से ही उनका जीवन कठिनाईयों से भरा रहा. हालांकि गरीबी की बेड़ियों के बाद भी उनके मन में समाज को उठाने का जज्बा पनप रहा था. जिसको अंजाम देने के लिए उन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बाद भी अपनी पढ़ाई पूरी की. इसके बाद मुर्मू का शिक्षा से जीवनभर का नाता बन गया. उन्होंने श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन सेंटर में बिना सैलरी लिए बच्चों को पढ़ाया.जिस भी क्षेत्र में मुर्मू ने कदम रखा है, वहां उन्होंने अपने काम का लोहा मनवाया है. एक विधायक के तौर पर भी उन्हें स्टार परफॉर्मर चुना गया था और 2007 में सर्वश्रेष्ठ विधायक होने के नाते उन्हें नीलकंठ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था. ओडिशा में मुर्मू ने कई मंत्रालयों की कमान संभाली थी. वो राज्य सरकार में ट्रांसपोर्ट और कॉमर्स मंत्रालय संभाल चुकी हैं. इससे पहले भी उन्होंने मछलीपालन और पशु पालन विभाग में भी काम किया है. वे पूर्व में ओडिशा सरकार में मंत्री और झारखंड की राज्यपाल रह चुकी हैं। ओडिशा के जनजाति-बहुल जिले मयूरभंज के एक सुदूर गांव में एक जनजातीय परिवार में जन्मी द्रौपदी राजनीति में आने से पहले एक सामान्य क्लर्क और शिक्षिका के रूप में कार्य कर चुकी हैं। श्रीमती मुर्मू ने वर्ष 1997 में भजपा के साथ अपने राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की थी और भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष रही। वे दो बार राज्य विधानसभा में बतौर बीजेपी विधायक चुनी गयीं।

संघर्षों की दास्तान हैं द्रौपदी मुर्मू

उनका निजी जीवन संघर्ष और दुखों से भरा रहा, लेकिन सार्वजनिक जीवन में वे अनगिनत ऊंचाइयां छूती रहीं। पति और दो-दो नौजवान पुत्रों को खोने के बावजूद वे समाजसेवा में डटी रहीं। झारखंड की पहली महिला राज्यपाल और किसी भी भारतीय प्रदेश की पहली जनजातीय महिला राज्यपाल बनकर उन्होनें कीर्तिमान स्थापित किया। द्रौपदी मुर्मू के परिवार में उनकी पुत्री इतिश्री मुर्मू (बैंक कर्मचारी) और दामाद गणेश हेम्ब्रम हैं जोकि एक रग्बी खिलाड़ी हैं। बता दें, परिवार में एक के बाद एक मौत के बाद भी नहीं टूटी द्रौपदी मुर्मू, संघर्षों से भरी रही उनकी जिंदगी। द्रौपदी मुर्मू को कई व्यक्तिगत त्रासदियों का सामना करना पड़ा. 2009 से 2014 के बीच उन्होंने अपने पति, दो बेटों, मां और भाई को खो दिया. 2009 में उनके एक बेटे की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी. 2009 की रिपोर्टों के अनुसार, लक्ष्मण मुर्मू (25) अपने बिस्तर में अचेत अवस्था में पाए गए थे. उनके पति श्याम चरम मुर्मू का 2014 में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था. 2012 में द्रौपदी मुर्मू ने अपने दूसरे बेटे को एक सड़क दुर्घटना में खो दिया. मुर्मू की बेटी इतिश्री मुर्मू एक बैंक में काम करती हैं और उनकी शादी गणेश हेम्ब्रम से हुई है, जो एक रग्बी खिलाड़ी हैं. कहा जा सकता है द्रौपदी ने जीवन भर बहुत संघर्ष किया. वे उस दौर में अपनी पढ़ाई की जब लड़कियों को हमेशा कहा जाता था कि तुम पढ़कर क्या करोगी. लेकिन अब उन्होंने साबित कर दिया कि वह क्या कर सकती है.

साफ-सुथरी छवि की लो प्रोफाइल लीडर

द्रौपदी मुर्मू न केवल लो प्रोफाइल राजनेता हैं, बल्कि उनकी छवि बेहद साफ-सुथरी है. किसी कंट्रोवर्सी में कभी नहीं पड़ीं. शिक्षित और बेदाग छवि की वजह से वह भाजपा आलाकमान की पहली पसंद बनीं. बता दें कि द्रौपदी मुर्मू भारतीय जनता पार्टी के सोशल ट्राइब मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी रह चुकीं हैं. द्रौपदी मुर्मू ने झारखंड की पहली महिला राज्यपाल के रूप में 18 मई 2015 को शपथ ली थी. पांच वर्ष का कार्यकाल 18 मई 2020 को पूरा हो गया था, लेकिन कोरोना के कारण राष्ट्रपति द्वारा नयी नियुक्ति नहीं किये जाने के कारण श्रीमती मुर्मू का कार्यकाल का स्वतः विस्तार हो गया. छह वर्ष एक माह 18 दिन का रहा. अपने पूरे कार्यकाल में कभी विवादों में नहीं रहीं. बल्कि हमेशा जनजातीय मामलों, शिक्षा, कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य को लेकर सजग रहीं.

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