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कसनी होगी तालीबानी कट्टरता पर नकेल

उदयपुर और अमरावती सहित पूर्व में घटित कमलेश तिवारी जैसी ’सर तन से जुदा’ वाली सोच कोई एक-दो दिन में पैदा नहीं हो गयी, बल्कि इसके लिए सालों-साल से ब्रेनवास किया जाता रहा होगा। और यही ब्रेनवास वाली जगह पर हमला करना होगा या यूं कहे निगाहबंदी रखनी होगी जहां से इस तरह के कट्टरता वाली सोच की ट्रेनिंग दी जाती है। इस हत्याकांड में एजेसियों के हाथ वो सबूत और सुराग लग रहे हैं जो आतंक की पूरी फाइ्ल के पन्ने दर पन्ने खोल दें. आरोपियों का सीसीटीवी, बाइक और खंजर सबकुछ साजिश का पर्दाफाश कर रहे हैं. एजेंसिंयों को ऐसे सबूत हाथ लग चुके हैं, जो अब जांच को आगे बढ़ाने में न सिर्फ मदद करेंगे बल्कि आरोपियों के सीने में छुपे इस दहशतगर्दी के मंसूबों का भी खुलासा हो जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है क्या देश में कट्टरपंथी आउट ऑफ कंट्रोल हो गए हैं? क्या ये कट्टरपंथी भारत को सीरिया और अफगानिस्तान बनाने की साजिश रच रहे है? मोदी-योगी विरोध में देश को सीरिया कौन बना रहा है? क्या भारत को इस्लामिक स्टेट बनाने में साजिशे रची जा रही है? क्या इनके लिए सरिया ही रूल आफ लॉ है? क्योंकि कहीं न कहीं उदयपुर व अमरावती में हुई हत्या की वजह बढ़ती कट्टरता ही जिम्मेदार है।

-सुरेश गांधी

फिलहाल, राजस्थान के उदयपुर और अमरावती में नूपुर शर्मा वाले पोस्ट पर सर तन से जुदा की गूंज भारत ही नहीं पूरी दुनिया तक पहुंच गई। कमलेश तिवारी सहित हाल के ये दो घटनाएं ऐसी हैं जो यह चीख-चीख कर कह रही है कि भारत में तालिबानी कट्टरता तेजी से पनप रही है। वस्तुतः आज जो यह एक नई तरह की शुरूआत हो रही है, उसे यहीं नहीं रोका गया तो भविष्य के भारत को लेकर सिर्फ इतना ही अभी कहा जा सकता है कि आने वाले वक्त में सर्वत्र दंगे व मानवाधिकारों का हनन होता ही दिखाई देगा। सवाल ये है कि हम तेज़ी से पांव पसारती उग्रवादी विचारधारा को कैसे रोक सकते हैं? इसके चंगुल में फंसने वालों को कैसे बचा सकते हैं? हमारे सियासतदान सच का सामना कब करेंगे? वे कब मानेंगे कि देश में कट्टरता की जड़े अंदर ही अंदर गहरी होती जा रही है।

राजनेता और बुद्धिजीवी कहना बंद करेंगे कि आतंकवाद का मजहब से कोई वास्ता नहीं है और कुछ गुमराह युवकों के कारण इस्लाम को बदनाम करना गलत है। बेरोजगारी न होती, गुुरबत न होती, तो जिहादी आतंकवाद भी न होता। जबकि सच यह है कि आईएस जैसा आतंकी संगठन एक विचारधारा का डरावना प्रतीक है। तालिबानी सोच में उसमें तड़का लगा रहा है। जानकारों की मानें तो अक्सर कट्टरपंथी झुकाव के पीछे विचारधारा से प्रेम कारण नहीं होता. पहचान के संकट से जूझ रहे युवा ही अक्सर कट्टरपंथ की ओर झुकते हैं. पिछले कुछ सालों से मौलानाओं की तकरीरें सुने तो जहां इस्लाम का अति उदार रूप दिखता था, वहां भी कट्टरपंथी पहुंच गया है। लेकिन हमारे सेक्यूलर राजनेताओं को अपनी धर्मनिरपेक्षता पर इतना गर्व है कि उन्होंने बढ़ती जेहादी संस्थाओं की तरफ देखा तक नहीं, उन पर पाबंदियां लगाना तो दूर की बात। आज भी वे आईएस या तालीबानी हरकतों का नाम लेने से कतराते हैं। ऐसा होता रहा, तो वह दिन दूर नहीं है, जब आईएस या तालीबानी प्रभाव देश भर में दिखने लगेगा।

हमारे पड़ोस में एक भी देश नहीं है, जो इस जहरीली विचारधारा के फैलते प्रभाव से बच सका है। ऐसे में हम कैसे बच पाएंगे, जब तक हम इसका खुलकर विरोध करने को तैयार नहीं हैं? आईएस की विचारधारा के मुताबिक, न केवल बुतपरस्त लोग, बल्कि वे मुसलमान भी काफिर हैं, जो सूफियाना इस्लाम से प्रभावित हो चुके हैं। भारतीय इस्लाम पूरी तरह से सूफियाना है। नीदरलैंड के सांसद गिर्ट विल्डर्स ने उदयपुर व अमरावती हत्याकांड के तुरंत बाद कई ट्वीट कर अपना आक्रोश जाहिर किया है। उन्होंने कहा कि मैं भारत को एक मित्र के रूप में कहता हूं कि वो सहिष्णु के प्रति सहिष्णु होना बंद करो. बता दें, उदयपुर में जिस तरह से टेलर कन्हैयालाल की बर्बरता से हत्या हुई है, ठीक उसी तरह की वारदात 21 जून को महाराष्ट्र के अमरावती में भी हुई. दावा है कि अमरावती में उमेश कोल्हे नाम के कैमिस्ट ने सोशल मीडिया पर नूपुर शर्मा के समर्थन में पोस्ट की थी, जिसके बाद उनका कत्ल किया गया. उदयपुर में कन्हैया लाल की गला काटकर हत्या की गई थी और अमरावती में भी हत्यारों ने केमिस्ट उमेश कोल्हे का गला काट दिया था.

वर्षों से पनपता कट्टरता
उदयपुर की घटना में पकड़े गए गौस मोहम्मद की जुबानी मानें तो वह पिछले काफी समय से पाकिस्तान में बैठे आतंकवादियों के सम्पर्क में था. इनमें दो लोगों के नाम शुरुआती जांच में सामने आए हैं. इनमें एक आंतकवादी का नाम है, सलमान हैदर और दूसरे का नाम अबु इब्राहिम है. सलमान हैदर ने ही गौस मोहम्मद की मुलाकत अबु इब्राहिम से कराई थी. फिर अबु इब्राहिम ने सलमान हैदर को जेहादी बनने की ट्रेनिंग पाकिस्तान में दी थी. ट्रेनिंग के बाद वह पिछले कई वर्षों से भारत में आतंकवादियों के स्लीपर सेल नेटवर्क से जुड़ा हुआ था. इसके अलावा उसने वर्ष 2013 में एक बाइक भी खरीदी थी, जिसका नम्बर मुंबई बम ब्लास्ट की तारीख 2611 है. हैरानी की बात ये है कि रियाज ने अपनी बाइक के लिए ये नम्बर पांच हजार रुपये में खरीदा था. मुम्बई के 26/11 हमले में 175 बेकसूर लोग मारे गए थे. अब आप खुद अन्दाजा लगा सकते हैं कि इस आरोपी की क्या मानसिकता रही होगी? बड़ी बात ये है कि इसने ये बाइक और ये नम्बर 2013 में लिया था और उस समय नूपुर शर्मा का ऐसा कोई मामला नहीं था. तो इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाएगा? कड़वा सच ये है कि, उदयपुर में जिन लोगों ने कन्हैया लाल की हत्या की, वो इस्लामिक कट्टरपंथ से प्रेरित थे. इतना ही नहीं ये दोनों ही आरोपी दावत-ए-इस्लामी नाम के संगठन से भी जुड़े हुए थे. जिस पर भारत में जबरन धर्म परिवर्तन कराने के आरोप लगते रहे हैं और अब कानपुर में इस संगठन के एक मरकज की जांच शुरू कर दी है. जिसके 50 हजार अनुयायी यहां हो सकते हैं.

बड़े नेता को सलटाने की भी थी योजना
उदयपुर की घटना में आज हमारे देश के लिए तीन बड़े सवाल छिपे हैं? पहला, क्या अभिव्यक्ति की आजादी को धर्म के आधार पर बांटा जा सकता है? दूसरा, क्या धार्मिक अपमान के मुद्दे पर किसी की हत्या करना जायज है? तीसरा, क्या भारत संविधान के हिसाब से चलेगा या शरिया कानून के हिसाब से? आज इन सवालों के जवाब आपको भी जरूर तलाशने चाहिए. देखा जाएं तो कन्हैयालाल हत्याकांड को बहुत ही सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया था. पाकिस्तानी हैंडलर सलमान हैदरऔर अबु इब्राहिम के कहने पर ही मोहम्मद रियाज अत्तारी भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा का कार्यकर्ता बनना चाह रहा था ताकि अंदर की सूचनाएं उसे मिल सकें. जांच एजेंसी के सूत्र ने बताया कि मोहम्मद रियाज अत्तारी तीन साल से भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे के जरिए पार्टी के बड़े नेताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान में बैठे आका सलमान ने उससे कहा था कि बीजेपी की बैठकों में जाया करे और वहां से सूचनाएं भेजा करे. प्लानिंग थी कि बीजेपी में शामिल होकर रियाज बड़े नेताओं का भरोसा जीते और फिर कोई बड़ा कांड करे, जिससे देश में हंगामा खड़ा हो जाए. जांच एजेंसियों से मिली जानकारी के मुताबिक, पूछताछ में रियाज ने बताया कि बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के नेताओं का भरोसा जीतने के लिए उसने बहुत सारे अपने आसपास के लोगों को भी पार्टी से जोड़ा था. वह यह सब कुछ अपने पाकिस्तानी हैंडलर सलमान से मिले निर्देश पर ही कर रहा था. मगर उसे ज्यादा सफलता नहीं मिल रही थी, क्योंकि बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के नेता उसे बड़ी बैठकों में नहीं बुलाते थे. क्या बीजेपी के किसी बड़े नेता पर हमले की तैयारी थी? अब इसके बारे में भी एजेंसियां जांच कर रही हैं.

मदरसों में सिखाया जाता है सिर कलम करने का पाठ : आरिफ
केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि देश के मदरसे नफरत की जड़ हैं। उन्होंने यह प्रतिक्रिया उदयपुर की घटना को लेकर दी है। उनका कहना है कि मदरसों में ईशनिंदा करने वालों का सिर कलम करने की बात सिखाई जाती है। मासूम बच्चों को ही यह ट्रेनिंग दी जा रही है कि कोई विरोध में बोले तो उसका सिर काट दो। उन्होंने कहा कि सवाल यह है कि क्या हमारे बच्चों को यह सिखाया जा रहा है कि जो ईशनिंदा करे, उसका गला काट दिया जाए। जबकि यह कानून कुरान से नहीं आया है। यह कानून कुछ लोगों ने शहंशाहों के जमाने में बनाए। अब यही कानून बच्चों को सिखाया जा रहा है। राज्यपाल ने कहा कि 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार है, उन्हें आप शिक्षा से वंचित नहीं रख सकते लेकिन स्पेशलाइज्ड तरीके की शिक्षा नहीं दे सकते। उन्होंने कहा कि हम लक्षण देखकर चिंता तो व्यक्त करते हैं लेकिन बीमारी को मानने से इनकार कर देते हैं।

कट्टरता आतंकवाद की जननी
केरल के राज्यपाल हमेशा कट्टरता का विरोध करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मौलाना और मदरसे मुसलमानों के एक तबके को कट्टर बना रहे हैं। वे गैर-मुसलमानों के खिलाफ भड़काते हैं, जिससे नफरत पैदा होती है। दूसरे धर्मों के प्रति नफरत का भी यही कारण है। मदरसे से निकले बच्चे जब बड़े होते हैं तो उनके जेहन में दूसरे धर्म और उनको मानने वालों के प्रति संदेह भरा होता है। इस पर तत्काल रोक लगाने की आवश्यकता है। एक रिसर्च के मुताबिक, भारत में 74 फीसदी मुस्लिम आबादी इस्लामी अदालतों यानि शरीयत कानून को लागू करने के पक्ष में है। 59 फीसदी मुसलमानों ने भी विभिन्न धर्मों के अदालतों का समर्थन किया है। यानि, भारत में हर चार मुसलमान में 3 मुसलमान शरीया अदालत चाहता है। उनका कहना है कि भारत को अलग अलग धार्मिक मान्यताओं वाले देश होने से फायदा मिलता है। मुसलमानों ने सर्वे में कहा है कि मुसलमानों का धार्मिक अलगाव अन्य धर्मों के प्रति उदारता के रास्ते में नहीं आता है और ऐसा ही हिंदुओं के साथ भी है। हालांकि, ज्यातातर भारतीयों ने इस बात पर चिंता जताई है कि शरिया अदालतों का अगर निर्माण होना शुरू हो जाए तो न्यायिक व्यवस्था कमजोर हो जाएंगी। क्योंकि, शरिया अदालतों के निर्माण के बाद एक बड़ी आबादी मुख्य अदालतों का निर्देश मानने से इनकार करने लगेंगे और फिर देश की न्यायिक व्यवस्था की कमजोर हो जाएगी।

फ्रांस सरीखे कानून भारत में भी हो
फ्रांस एक नया कानून लेकर आया है जिसका मकसद है धार्मिक कट्टरपंथ को रोकना. फ्रांस में लाए गए क़ानून से भारत बहुत कुछ सीख सकता है। इस कानून में कहीं भी इस्लाम शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है लेकिन कहा जा रहा है कि यहां धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों से मतलब इस्लामिक कट्टरपंथ से ही है क्योंकि, फ्रांस इन दिनों इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों से ही परेशान है. इस कानून का मकसद है धार्मिक कट्टरपंथ को रोकना, लोगों को अलगाववाद के रास्ते से हटा कर, विकास के रास्ते पर ले जाना. ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा धर्मनिरपेक्ष माहौल पैदा करना. यानी इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए फ्रांस कट्टरपंथी ताकतों से भी टकराने के लिए तैयार है. सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इस क़ानून में भारत के लिए भी सीख छिपी है और वो ये कि अगर धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद का सामना कर रहे भारत में जल्द इस तरह का कोई क़ानून नहीं लाया गया तो परिणाम गंभीर भी हो सकते हैं. यानी फ्रांस में लाए गए क़ानून से भारत बहुत कुछ सीख सकता है। पहली बात अगर कोई व्यक्ति ये कहता है कि उसकी पत्नी या बच्ची की मेडिकल जांच कोई पुरुष डॉक्टर नहीं करेगा या शादी के लिए अगर कोई व्यक्ति किसी लड़की को मज़बूर करता है या एक से अधिक शादी करता है तो उस पर लगभग 13 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान इस क़ानून में है.

शरिया क़ानून के मुताबिक़ कोई भी मुसलमान चार शादी कर सकता है. लेकिन अब फ्रांस ने इस पर रोक लगा दी है. दूसरी बात इस क़ानून में सैमुएल पैटी के नाम से एक प्रावधान जोड़ा गया है, इसके तहत अगर कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी और अधिकारी के खि़लाफ़ उससे जुड़ी निजी जानकारियों को सोशल मीडिया पर शेयर करता है तो उस पर लगभग 40 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा और इसमें तीन साल की जेल का भी प्रावधान है. तीसरी बात सभी नागरिकों को फ्रांस की धर्मनिरपेक्षता का सम्मान करना होगा. चौथी बात अगर कोई व्यक्ति फ्रांस के किसी भी सरकारी अधिकारी या जनप्रतिनिधि को डराता है और उसे फ्रांस के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के ख़लिाफ़ जाने के लिए मजबूर करता है तो उसे 5 साल तक की जेल होगी और उस पर क़रीब 65 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा. पांचवीं बात अगर कोई व्यक्ति अपने बच्चों को घर पर ही पढ़ाना चाहता है तो उसे फ्रांस की सरकार से इसकी अनुमति लेनी होगी और इसकी ठोस वजह भी बतानी होगी. छठी बात सरकार के प्रतिनिधि ये सुनिश्चित करेंगे कि खेल कूद में किसी तरह का कोई लिंग भेदभाव न हो. जैसे लड़कियों के लिए अलग स्विमिंग पूल हो और लड़कों के लिए अलग फ्रांस की सरकार अब इसकी इजाजत नहीं देगी.

सातवीं बात इस नए क़ानून के तहत फ्रांस के सभी धार्मिक संस्थानों को विदेशों से मिलने वाले चंदे की जानकारी सरकार को देनी होगी. अगर फंडिंग 8 लाख रुपये से ज़्यादा है तो उन्हें ये सरकार को बताना होगा और ऐसा नहीं करने पर फ्रांस की सरकार ऐसे धार्मिक संस्थानों को देश से मिलने वाली आर्थिक सहायता बंद कर देगी. आठवीं बात जिन अलग अलग समूहों और संस्थाओं को सरकार से विशेष सहायता मिलती है, उन्हें एक समझौते पर हस्ताक्षर करने होंगे। इस समझौते के तहत उन्हें फ्रांस के संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का सम्मान करना होगा। नौवीं बात धार्मिक संस्थानों में ऐसे भाषण नहीं दिया जा सकेंगे, जिनसे दो समुदायों के बीच टकराव और वैमनस्य पैदा हो. दसवीं बात और आखिरीबात ये कि जिन लोगों पर फ्रांस में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप होगा, ऐसे लोगों पर धार्मिक संस्थानों में हिस्सा लेने पर 10 साल के लिए बैन लगा दिया जाएगा. इस कानून से जुड़ी खास यह है कि फ्रांस में अब धार्मिक चिन्हों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध होगा.

 

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